Saturday, 7 April 2018

Biography of most important persons

अब्राहम लिंकन की जीवनी

अमेरिका के 16 वाँ राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक भी स्कूल नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियों की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े। उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्याओं चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगो को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।



वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था की सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे। अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, ‘एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगो के आख मे आसु आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे की सब लोग शांति से जीवन बिताये।



1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगे।। इसी से ही लिंकन लोगो के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी मे कई बार असफलताओ का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा। लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’। यही मेरा धर्म है”।



मृत्यु -

14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला मे नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुयी।



एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।

अब्दुल कलाम की जीवनी

डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम एक प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक और भारत के 11वें राष्ट्रपति थे। उन्होंने देश के कुछ सबसे महत्वपूर्ण संगठनों (डीआरडीओ और इसरो) में कार्य किया। उन्होंने वर्ष 1998 के पोखरण द्वितीय परमाणु परिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ कलाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और मिसाइल विकास कार्यक्रम के साथ भी जुड़े थे। इसी कारण उन्हें ‘मिसाइल मैन’ भी कहा जाता है। वर्ष 2002 में कलाम भारत के राष्ट्रपति चुने गए और 5 वर्ष की अवधि की सेवा के बाद, वह शिक्षण, लेखन, और सार्वजनिक सेवा में लौट आए। उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।



प्रारंभिक जीवन -

अवुल पकिर जैनुलअबिदीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक मुसलमान परिवार मैं हुआ। उनके पिता जैनुलअबिदीन एक नाविक थे और उनकी माता अशिअम्मा एक गृहणी थीं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थे इसलिए उन्हें छोटी उम्र से ही काम करना पड़ा। अपने पिता की आर्थिक मदद के लिए बालक कलाम स्कूल के बाद समाचार पत्र वितरण का कार्य करते थे। अपने स्कूल के दिनों में कलाम पढाई-लिखाई में सामान्य थे पर नयी चीज़ सीखने के लिए हमेशा तत्पर और तैयार रहते थे। उनके अन्दर सीखने की भूख थी और वो पढाई पर घंटो ध्यान देते थे। उन्होंने अपनी स्कूल की पढाई रामनाथपुरम स्च्वार्त्ज़ मैट्रिकुलेशन स्कूल से पूरी की और उसके बाद तिरूचिरापल्ली के सेंट जोसेफ्स कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ से उन्होंने सन 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक किया। उसके बाद वर्ष 1955 में वो मद्रास चले गए जहाँ से उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1960 में कलाम ने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की।



कैरियर -

मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए। कलाम ने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलीकाप्टर का डिजाईन बना कर किया। डीआरडीओ में कलाम को उनके काम से संतुष्टि नहीं मिल रही थी। कलाम पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा गठित ‘इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ के सदस्य भी थे। इस दौरान उन्हें प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के साथ कार्य करने का अवसर मिला। वर्ष 1969 में उनका स्थानांतरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में हुआ। यहाँ वो भारत के सॅटॅलाइट लांच व्हीकल परियोजना के निदेशक के तौर पर नियुक्त किये गए थे। इसी परियोजना की सफलता के परिणामस्वरूप भारत का प्रथम उपग्रह ‘रोहिणी’ पृथ्वी की कक्षा में वर्ष 1980 में स्थापित किया गया। इसरो में शामिल होना कलाम के कैरियर का सबसे अहम मोड़ था और जब उन्होंने सॅटॅलाइट लांच व्हीकल परियोजना पर कार्य आरम्भ किया तब उन्हें लगा जैसे वो वही कार्य कर रहे हैं जिसमे उनका मन लगता है। 1963-64 के दौरान उन्होंने अमेरिका के अन्तरिक्ष संगठन नासा की भी यात्रा की।



परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना, जिनके देख-रेख में भारत ने पहला परमाणु परिक्षण किया, ने कलाम को वर्ष 1974 में पोखरण में परमाणु परिक्षण देखने के लिए भी बुलाया था। सत्तर और अस्सी के दशक में अपने कार्यों और सफलताओं से डॉ कलाम भारत में बहुत प्रसिद्द हो गए और देश के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम गिना जाने लगा। उनकी ख्याति इतनी बढ़ गयी थी की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने कैबिनेट के मंजूरी के बिना ही उन्हें कुछ गुप्त परियोजनाओं पर कार्य करने की अनुमति दी थी। भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का प्रारम्भ डॉ कलाम के देख-रेख में किया। वह इस परियोजना के मुख कार्यकारी थे। इस परियोजना ने देश को अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें दी है। जुलाई 1992 से लेकर दिसम्बर 1999 तक डॉ कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सचिव थे।



भारत ने अपना दूसरा परमाणु परिक्षण इसी दौरान किया था। उन्होंने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आर. चिदंबरम के साथ डॉ कलाम इस परियोजना के समन्वयक थे। इस दौरान मिले मीडिया कवरेज ने उन्हें देश का सबसे बड़ा परमाणु वैज्ञानिक बना दिया। वर्ष 1998 में डॉ कलाम ने ह्रदय चिकित्सक सोमा राजू के साथ मिलकर एक कम कीमत का ‘कोरोनरी स्टेंट’ का विकास किया। इसे ‘कलाम-राजू स्टेंट’ का नाम दिया गया।



भारत के राष्ट्रपति -

एक रक्षा वैज्ञानिक के तौर पर उनकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि के मद्देनज़र एन.डी.ए. की गठबंधन सरकार ने उन्हें वर्ष 2002 में राष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी लक्ष्मी सहगल को भारी अंतर से पराजित किया और 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लिया। डॉ कलाम देश के ऐसे तीसरे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही भारत रत्न ने नवाजा जा चुका था। इससे पहले डॉ राधाकृष्णन और डॉ जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनने से पहले ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा चुका था। उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें ‘जनता का राष्ट्रपति’ कहा गया। अपने कार्यकाल की समाप्ति पर उन्होंने दूसरे कार्यकाल की भी इच्छा जताई पर राजनैतिक पार्टियों में एक राय की कमी होने के कारण उन्होंने ये विचार त्याग दिया। 12वें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के समाप्ति के समय एक बार फिर उनका नाम अगले संभावित राष्ट्रपति के रूप में चर्चा में था परन्तु आम सहमति नहीं होने के कारण उन्होंने अपनी उमीद्वारी का विचार त्याग दिया।



राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद का समय -

राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद डॉ कलाम शिक्षण, लेखन, मार्गदर्शन और शोध जैसे कार्यों में व्यस्त रहे और भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिल्लोंग, भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर, जैसे संस्थानों से विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर जुड़े रहे। इसके अलावा वह भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर के फेलो, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी, थिरुवनन्थपुरम, के चांसलर, अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई, में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी रहे। उन्होंने आई। आई। आई। टी। हैदराबाद, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और अन्ना यूनिवर्सिटी में सूचना प्रौद्योगिकी भी पढाया था। कलाम हमेशा से देश के युवाओं और उनके भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में बातें करते थे। इसी सम्बन्ध में उन्होंने देश के युवाओं के लिए “व्हाट कैन आई गिव’ पहल की शुरुआत भी की जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का सफाया है। देश के युवाओं में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2 बार (2003 & 2004) ‘एम.टी.वी. यूथ आइकॉन ऑफ़ द इयर अवार्ड’ के लिए मनोनित भी किया गया था। वर्ष 2011 में प्रदर्शित हुई हिंदी फिल्म ‘आई ऍम कलाम’ उनके जीवन से प्रभावित है। शिक्षण के अलावा डॉ कलाम ने कई पुस्तकें भी लिखी जिनमे प्रमुख हैं – ‘इंडिया 2020: अ विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘विंग्स ऑफ़ फायर: ऐन ऑटोबायोग्राफी’, ‘इग्नाइटेड माइंडस: अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’, ‘मिशन इंडिया’, ‘इंडोमिटेबल स्पिरिट’ आदि।



पुरस्कार और सम्मान -

देश और समाज के लिए किये गए उनके कार्यों के लिए, डॉ कलाम को अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। लगभग 40 विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी और भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया।



मृत्यु -

27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिल्लोंग, में अध्यापन कार्य के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद करोड़ों लोगों के प्रिय और चहेते डॉ अब्दुल कलाम परलोक सिधार गए।

अमिताभ बच्चन की जीवनी

अमिताभ बच्चन का जन्म अक्टूबर 11, 1942 को उतरप्रदेश के जिले इलाहबाद में हिन्दू परिवार में हुआ और इनके बचपन का नाम “इन्कलाब” था जो बाद में बदल कर अमिताभ रख दिया गया। ‘इन्कलाब’ नाम जो है वो आजादी की लड़ाई में इस्तेमाल होने वाले नारे ‘ इन्कलाब जिंदाबाद‘ से प्रेरित था। अमिताभ नाम का मतलब होता है “ ऐसा दीपक जो कभी नहीं बुझे “। अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन जो खुद एक महशूर हिन्दी के कवि थे और उनकी माता तेजी बच्चन जो कराची से वास्ता रखती है ने ही उन्हें स्टेज की दुनिया में आने के प्रेरित किया। वैसे आपके जानने लायक एक दिलचस्प बात और भी है कि अमिताभ का उपनाम श्रीवास्तव है लेकिन इनके पिता ने अपनी रचनाओं को बच्चन नाम से प्रकशित करवाया जिसके कारण उसके बाद पूरे परिवार के साथ यह नाम जुड़ गया।



करियर और फिल्म इंडस्ट्री –

शुरू में अमिताभ के लिए चीजे आसान थी क्योंकि इन्हें फिल्मो की दुनिया में आने के लिए किसी भी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा और इसकी वजह है अमिताभ बच्चन की राजीव गाँधी से मित्रता होना क्योंकि इसी वजह से इंदिरा गाँधी के हाथ का लिखा सिफारिशी ख़त की वजह से उन्हें के ए अब्बास की फिल्म “ सात हिन्दुस्तानी “ में आराम से काम करने का मौका मिल गया। वैसे हम यह कह सकते है कि ऐसा तो है कि अमिताभ ने अपने टैलेंट और अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में बादशाह का मुकाम हासिल किया हो या किसी और भी पैमाने पर अमिताभ बच्चन को हम महान कह सकते है लेकिन एक बात तो है जितनी आसानी से अमिताभ को बॉलीवुड में काम मिला वो भी इंदिरा गाँधी के सिफारिशी ख़त की वजह से तो मेरे गले से अमिताभ को महान कहने की बात गले नहीं उतरती है क्योंकि अगर हम रणवीर सिंह (Ranveer singh) जैसे सितारों की बात करें तो मुझे तो उनके सरीखें सितारे ही महान लगते है आज के समय में जिन्होंने एक संघर्ष के बाद सितारा बनने का मुकाम हासिल किया है। हालाँकि अमिताभ ने फिल्मो में दुनिया में अपना हाथ अजमाने से पहले एक शिपिंग कम्पनी में नौकरी की थी और बाद में इनके माँ के द्वारा उत्साहित करने के बाद ये नौकरी छोडके मुंबई आ गये थे। वंहा इन्हें काम करने के लिए 800/- रूपये / महीना वेतन मिलता था।



शिक्षा –

अमिताभ बॉलीवुड के उन अभिनेताओं में भी है जिन्होंने अच्छी खासी पढाई करी है क्योंकि बॉयज हाई स्कूल में पढाई के बाद इन्होने शेरवूड कॉलेज जो नैनीताल में है से आर्ट में अपनी ग्रेजुएशन की हुई है साथ ही इसके बाद विज्ञानं में स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए दिल्ली के प्रसिद्द KMC कॉलेज से पढाई की और इसके बाद MA के लिए ज्ञान प्रबोधिनी कॉलेज जो इलाहाबाद में है से की।



सफलता के लिए संघर्ष –

वैसे अमिताभ को भले ही फिल्मो में आने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा लेकिन बाद के दिनों में चीजे इनके लिए मुश्किल थी और यही वजह है कि न केवल अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ने कोई अच्छा प्रदर्शन कमाई के हिसाब से नहीं किया लेकिन इस फिल्म में इनकी भूमिका के लिए इन्हें “ सर्वश्रेष्ठ नवागन्तुक अभिनेता“ के लिए पुरस्कार मिला और इसके बाद करीब सात साल तक के अपने संघर्ष में इन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली और तब तक ऐसा कहा जाता है कि वो निर्माता और निर्देशक महमूद साहब के घर में रुके।



स्टार बनने –

अमिताभ बच्चन की जिन्दगी में स्टार बनने के लिए महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1973 में आई प्रकाश मेहरा की एक फिल्म में इन्हें एक इंस्पेक्टर का रोल मिला जिसमे इनके किरदार का नाम “ इंस्पेक्टर खन्ना“ था और उस किरदार में अमिताभ बच्चन एकदम अलग तरह के रोल में थे और साथ ही इनकी भारी आवाज जिसके लिए इन्हें आल इंडिया रेडियो में बोलने वाले के पद के लिए निकाल दिया गया था वही इनकी खासियत भी बनी ऐसे में जनता के लिए अमिताभ का यह रूप बहुत पसंद आने वाला था और इसके बाद बॉलीवुड के एक्शन हीरो और “ अंगरी यंगमैन“ की रूप में एक नई छवि अमिताभ की जनता के बीच में बनी जिसने इन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया। यह वही साल था जिसमे अमिताभ ने जय भादुड़ी से शादी करी और कह सकते है कि अमिताभ के साथ अब उनका ‘लेडी लक’ भी था क्योंकि इसी साल अमिताभ बच्चन ने जया के साथ 3 जून को बंगाली संस्कार से विवाह भी किया था।



लाइफ चेंजिंग इवेंट्स –

1976 से लेकर 1984 तक अमिताभ को अपनी कई सारी कामयाब फिल्मो की वजह से बहुत सारे पुरस्कार भी मिले जिसमे उनकी बेहद कामयाब दीवार और शोले जैसी फिल्म भी है शोले तो बॉलीवुड के इतिहास में सबसे कामयाब फिल्मो में से एक है। यही एक वजह है कि अमिताभ फिल्म इंडस्ट्री के सबसे कामयाब और पहचान वाले अभिनेता और सबसे अधिक फिल्मफेयर अवार्ड्स पाने वाले अभिनेताओ में से एक है और साथ ही आपको बता कि अमिताभ ने अब तक तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और बारह सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल है और एक तरह से यह रिकॉर्ड है। 1984-1987 तक संसद के निर्वाचित सदस्य के रूप में भी इन्होने अपनी भूमिका दी है असल में 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अपने दोस्त राजीव गाँधी की सलाह पर वो राजनीती में उतरे और इलाहाबाद की लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और राजनीती के चाणक्य कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को हर दिया लेकिन कुछ समय बाद ही यानि राजनीति में आने के तीन साल बाद ही अमिताभ बच्चन ने राजनीती को अलविदा कह दिया।



अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग के अलावा भी पार्श्वगायक के रूप में भी अपना योगदान दिया है साथ ही एक अच्छे विज्ञापन करता के रूप में भी अमिताभ की पहचान बनी हुई है और उम्र के इस दौर में भी जब वो 73 साल के हो चुके है अभी भी सक्रिय है। ‘कौन बनेगा करोडपति ‘ शो में भी इन्होने होस्ट के तौर पर काम किया है और अमिताभ बच्चन को पसंद करने वाले करोडो में है। अमिताभ ने 12 से अधिक फिल्मो में डबल रोल किया है और एक फिल्म “ महान “ के लिए तो उन्होंने triple role भी किया है। आज के दिन में अमिताभ के पास एक खास मुकाम है और इसी वजह से इन्हें फ़्रांस के एक शहर द्युविले की मानद नागरिकता भी इनके योगदान को देखकर मिली है जो किसी भी विदेशी नागरिक के लिए न केवल सम्मान की बात है बल्कि बहुत ही दुर्लभ लोगो के पास ये है क्योंकि यह केवल ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पास और पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाले रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन तथा पोप जॉन पॉल द्वितीय को ही दिया गया है।



बच्चों और परिवार –

अमिताभ बच्चन की दो संताने है अभिषेक बच्चन और श्वेता नंदा बच्चन जिसमें से अभिषेक बच्चन भी खुद अभिनेता है और अभिषेक का विवाह ऐश्वर्या राय के साथ हुआ है जो बेहद खूबसूरत अभिनेत्री रह चुकी है और सलमान खान की एक्स – गर्लफ्रेंड भी रह चुकी है। हालाँकि एक्टिंग की दुनिया में अभिषेक का सिक्का जरुर नहीं चला लेकिन अगर लड़की के मामले में बात करें तो करोड़ो दिलो को धड़कन रह चुकी ऐश्वर्या को अपने हमसफ़र के रूप में पाने वाले अभिषेक बच्चन बेइंतिहा लकी है।



लव लाइफ और अफेयर्स 

अमिताभ के अफेयर्स की बात करें तो सन 1978 में अमिताभ और रेखा की बीच बढती नजदीकियों को लेकर न केवल अमिताभ के घर में बहुत हंगामा हुआ बल्कि देशभर के अख़बारों में भी यह सुर्खियाँ बनती जा रही थी इस बारे में सुना गया है कि रेखा दिल ही दिल में अमिताभ बच्चन को बहुत पसंद करती थी लेकिन उन्होंने सही तरीके से कभी इसे जाहिर नहीं किया और न ही अमिताभ ने इस रिश्ते के बारे में कभी कुछ कहा जिसकी वजह से मामला रहस्मयी होता गया और शायद इसी वजह से जय ने रेखा को इस बारे में बात करने के लिए डिनर पर बुलाया था।



सामाजिक रूप से सक्रिय –

अमिताभ बच्चन सोशल साइट्स पर भी काफी एक्टिव रहते है और अपने फेंस के साथ जुड़े रहने के लिए ब्लॉग और फेसबुक और ट्विटर पर भी काफी सक्रिय रहते है। अमिताभ बच्चन के बारे में शिवसेना प्रमुख रह चुके स्वर्गीय बाल ठाकरे यंहा तक कह चुके है कि अमिताभ के योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न देना तो बनता है क्योंकि ऐसे भी देश है जंहा लोग भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बारे में नहीं जानते लेकिन वो अमिताभ बच्चन को जानते है ऐसे में उन्हें भारत रत्न दिया जाना सही है साथ ही यह बात भी गौर करने लायक है कि उन्होंने यह बात ऐसे समय में कही थी जब महाराष्ट्र में मराठी बनाम उतर भारतीय विवाद चल रहा था।

सचिन तेंदुलकर की जीवनी

सचिन तेंदुलकर ने समय के साथ रनों का अम्बार लगा दिया है। उन्होंने 29 जून, 2007 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध बेलाफास्ट (आयरलैंड) में खेलते हुए एक दिवसीय मैचों में 15000 रन पूरे कर लिए। इतने रन बनाने के बाद सचिन। विश्व के ऐसे प्रथम खिलाड़ी बन गए, जिंन्होंने इतने बड़े आंकड़े को छुआ है। विश्व के श्रेष्ठतम बल्लेबाज माने जाने वाले आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन ने एक बार सचिन के बारे में कहा था- ”मैंने उसे टीवी पर खेलते हुए देखा और उसकी खेल तकनीक देखकर दंग रह गया। तब मैंने अपनी पत्नी को अपने पास बुला कर उसे देखने को कहा। हालांकि मैंने स्वयं को खेलते हुए कभी नही देखा, लेकिन मुझे महसूस होता है कि यह खिलाड़ी ठीक वैसा ही खेलता है जैसा मैं खेलता था।” वास्तव में सचिन क्रिकेट का हीरो और एक ऐसा रोल मॉडल है जिसे सभी भारतीय पसन्द करते हैं। कल की सी बात लगती है जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट क्षेत्र में उतरा-एक घुंघराले बालों वाला 15 वर्षीय सचिन, जिसकी भर्राई सी आवाज ने लोगों के दिल में स्थान बना लिया।



वह लगभग 15 वर्ष का ही था जब उसने 1988 में स्कूल के क्रिकेट मैच में काम्बली के साथ 664 रन बनाए थे। लोग उसके खेल का करिश्माई अंदाज़ देखते ही रह गए थे। इसके बाद उसका क्रिकेट के मैदान में अन्तरराष्ट्रीय मैचों में प्रदर्शन इतना अच्छा रहा है कि लोग कहते हैं कि वह वाकई लाजवाब है। सचिन तेंदुलकर ने 1989-90 में कराची में पाकिस्तान के विरुद्ध अपना पहला टैस्ट मैच खेल कर अपने क्रिकेट कैरियर की शुरुआत की थी। तब से अब तक के कैरियर में सचिन ने उन ऊंचाइयों को छू लिया है, जिसे छूना किसी अन्य क्रिकेट खिलाड़ी के लिए शायद ही सम्भव हो सके। आक्रामक बल्लेबाजी उसका अंदाज है। उसका बल्ला यूं घूमता है कि दर्शकों को अचम्भित कर देता है। यदि वह जल्दी आउट भी हो जाता है तो भी अक्सर अपना करिश्मा दिखा ही जाता है। गेंदबाजी में भी वह अपना करिश्मा कभी-कभी दिखा देता है। एक दिवसीय मैचों में दस हजार से अधिक रन बनाने वाला वह पहला बल्लेबाज है। उसने सौ से अधिक विकेट लेने का करिश्मा भी दर्शकों को दिखाया है। सचिन ने दर्शकों के मानस पटल पर अपने खेल की अविस्मरणीय छाप छोड़ी है।



उसने 20 टैस्टों और एक दिवसीय मैचों में अनेकों शतक व हजारों रन बना डाले हैं जितने आज तक कोई नहीं बना सका है। जब सचिन केवल 11 वर्ष का था, तब वह बेहद शैतान था। मां-बाप को वह अपनी शैतानियों से परेशान करता रहता था। एक बार वह शैतानी करते हुए पेड़ से गिर गया। तब सचिन के बड़े भाई अजीत के दिमाग में विचार आया कि उसे क्रिकेट की कोचिंग क्लास के लिए भेज दिया जाए ताकि उसकी अतिरिक्त ऊर्जा खेलों में खर्च हो सके। कहा जा सकता है कि यह सचिन की अतिविशिष्ट जिन्दगी की शुरुआत थी। आज सचिन 100 टैस्ट मैच खेलने वाला विश्व का 17वां खिलाड़ी बन चुका है। सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मैच खेला था। तब सचिन केवल 16 वर्ष का था और प्रथम पारी में वह बहुत ही नर्वस व घबराया हुआ था। सचिन को तब यूं महसूस हुआ था कि शायद वह जिन्दगी में आगे अन्तरराष्ट्रीय मैच और नहीं खेल सकेगा। अकरम और वकार की तेज गेंदों के सामने वह केवल 15 रन ही बना सका था। लेकिन दूसरे टेस्ट में जब उसे खेलने का मौका मिला तब उसने 59 रन बना लिए और उसके भीतर आत्मविश्वास जाग उठा। सचिन देखने में सीधा-सादा इंसान है। वह अति प्रसिद्ध हो जाने पर भी नम्र स्वभाव का है। वह अपने अच्छे व्यवहार का श्रेय अपने पिता को देता है। उसका कहना है- ”मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता के कारण हूँ। उन्होंने मुझ में सादगी और ईमानदारी के गुण भर दिए हैं। वह मराठी साहित्य के शिक्षक थे और हमेशा समझाते थे कि जिन्दगी को बहुत गम्भीरता से जीना चाहिए। जब उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा नहीं, क्रिकेट मेरे जीवन का हिस्सा बनने वाली है, उन्होंने उस बात का बुरा नहीं माना। उन्होंने मुझसे कहा कि ईमानदारी से खेलो और अपना स्तर अच्छे से अच्छा बनाए रखो। मेहनत से कभी मत घबराओ।” सचिन को भारतीय क्रिकेट टीम का कैप्टन बनाया गया था, परन्तु 2000 में उन्होंने मोहम्मद अजहरूद्‌दीन के आने के बाद वह पद छोड़ दिया।



सचिन, जिसे सुपर स्टार कहा जाता है, जीनियस कहा जाता है, जिसका एह-एक स्ट्रोक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, अपने पुराने मित्रों को आज भी नहीं भूला है चाहे वह विनोद काम्बली हो या संजय मांजरेकर। जब मुम्बई की टीम में सचिन ने खेलना आरम्भ किया था तो संजय ने राष्ट्रीय टीम की ओर से खेला था। ये दोनों पुराने मित्र हैं। क्रिकेट के अतिरिक्त सचिन को संगीत सुनना और फिल्में देखना पसन्द है। सचिन क्रिकेट को अपनी जिन्दगी और अपना खून मानते हैं। क्रिकेट के कारण प्रसिद्धि पा जाने पर वह किस चीज का आनन्द नहीं ले पाते-यह पूछने पर वह कहते हैं कि दोस्तों के साथ टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलना याद आता है। 29 वर्ष और 134 दिन की उम्र में सचिन ने अपना 100वां टैस्ट इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला। 5 सितम्बर, 2002 को ओवल में खेले गए इस मैच से सचिन 100वां टैस्ट खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बन गया। सचिन के क्रिकेट खेल की औपचारिक शुरुआत तभी हो गई जब 12 वर्ष की उम्र में क्लब क्रिकेट (कांगा लीग) के लिए उसने खेला। सचिन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का ब्रांड एम्बेसडर बना है। एम. आर. एफ. टायर, पेप्सी, एडिडास, वीजा मास्टर कार्ड, फिएट पैलियो जैसी नामी कम्पनियों ने उसे अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया। बड़ी कम्पनियों में विज्ञापन के लिए उसकी सबसे ज्यादा मांग है। 1995 में सचिन ने 70 लाख पचास हजार (7.5 मिलियन) डालर का वर्ल्ड टेल कम्पनी के साथ 5 वर्षीय अनुबंध किया। इससे सचिन विश्व का सबसे धनी क्रिकेट खिलाड़ी बन गया। इसके पूर्व ब्रायनलारा ने ब्रिटेन की कम्पनी के साथ सर्वाधिक 10 लाख 20 हजार डॉलर का अनुबंध किया था। सचिन ने 2002 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।



अन्तरराष्ट्रीय मैचों में 20000 रन बनाने वाला वह एकमात्र खिलाड़ी बन गया है। उसने 102 टेस्ट मैचों में खेली गई 162 पारी में 8461 रन बनाने के अतिरिक्त 300 एक दिवसीय मैचों में 11544 रन बनाने का रिकार्ड स्थापित किया है। उसके बारे में कहा जाता है वह विवियन रिचर्ड, मार्क वा, ब्रायन लारा सब को मिलाकर एक है। तेंदुलकर मानो एक आदमी की सेना है। वह शतक बनाता है, उसे गेंद दे दो, वह विकेट ले लेता है, वह टीम के अच्छे फील्डरों में से एक है। हम भाग्यशाली हैं कि वह भारतीय हैं। 25 मई, 1995 को सचिन ने डाक्टर अंजलि मेहता से विवाह कर लिया। उनके दो बच्चे हैं। बड़ी बच्ची का नाम ‘सराह’ है जिसका अर्थ है कीमती। छोटा बच्चा बेटा है। सचिन की अंजलि से 1990 में मुलाकात हुई। सचिन ने एक बार इंटरव्यू में कहा था- ”मुझे उससे प्यार इसलिए हो गया क्योंकि उसके गाल गुलाबी हो उठते हैं।” सचिन का पूरा नाम सचिन रमेश तेंदुलकर है। उसका नाम उसके माता-पिता ने अपने पंसदीदा संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा। सचिन ने अपना पहला साक्षात्कार दादर के एक ईरानी रेस्टोरेंट में अपने बड़े भाई से दिलवाया था क्योंकि तब उसमें अधिक आत्मविश्वास नहीं था। सचिन को बचपन में क्रिकेट से कोई विशेष लगाव न था। क्रिकेट में शामिल होने पर वह तेज गेंदबाज बनना चाहता था, इसलिए डेनिस लिली से प्रशिक्षण के लिए एम. आर. एफ. पेस एकेडमी में गया। तब उसे बताया गया कि उसे बल्लेबाजी पर ध्यान लगाना चाहिए। सचिन को अपनी मां के हाथ का भोजन बहुत पसन्द है विशेषकर सी-फूड। इस कारण उसके आने पर वह विशेष रूप से मछली मंगवाती है।



सचिन के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य -

मात्र बारह वर्ष की उम्र में सचिन ने क्लब क्रिक्रेट (कांगा लीग) मे खेलना शुरू किया।

बाम्बे स्कूल क्रिकेट टूर्नामेट में अपना पहला शतक 1936 में बनाया। फिर अगले वर्ष स्कूल क्रिकेट में 1200 रन बनाए जिनमें दो तिहरे शतक भी शामिल थे।

1988-89 में सचिन ने रणजी ट्राफी में बम्बई की तरफ से खेला और शतक बनाया। वह बम्बई की तरफ से खेलने वाला अब तक का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। अगले वर्ष वह ईरानी ट्राफी के लिए टीम में शामिल हुआ और 103 रन बनाए। उसके पश्चात् दलीप ट्राफी में शामिल होने पर पश्चिमी जोन की ओर पूर्वी जोन के विरुद्ध 151 रन बनाए। इस प्रकार तीनों देशीय टूर्नामेंट में प्रथम बार भाग लेने पर शतक लगाने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी बन गया।

जब सचिन और विनोद काम्बली ने मिल कर सेट जेवियर्स के विरुद्ध शारदाश्रम के 664 रन बनाए तब किसी भी क्रिकेट खेल के लिए यह विश्व रिकार्ड बन गया। इसमें सचिन ने 326 नाट आउट का स्कोर बनाया। फिर बाम्बे क्रिकेट की ओर से उसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी घोषित किया गया।

1991 में 18 वर्ष की आयु में सचिन यार्कशायर का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रथम खिलाड़ी बना। उस वर्ष उसे ‘वर्ष का क्रिकेटर’ चुना गया।

1992 में वह पहला खिलाड़ी बना जिसे तीसरे अम्पायर द्वारा आउट करार दिया गया।

सचिन ने अपने खेल की शुरुआत से लगातार हर टैस्ट मैच खेला और लगातार 84 टैस्ट खेले।

सचिन 29 वर्ष 134 दिन की आयु में 100वां टैस्ट मैच खेलने वाला सबसे कम आयु का खिलाड़ी बना।

सचिन का पहला टैस्ट 1989 में कराची में हुआ जो कपिल का 100 वां टैस्ट मैच था।

जिन खिलाड़ियों ने 100 या अधिक टैस्ट मैच खेले हैं, उनमें सचिन का औसत सर्वाधिक है यानी 57।99। जब कि उसके बाद मियादाद का 57।57 है और गावस्कर का (51।12)।

‘राजीव गाधी खेल रत्न’ पुरस्कार पाने वाला वर्ष 2006 तक सचिन एकमात्र क्रिकेटर हैं।

1992 में 19 वर्ष की आयु में टैस्ट मैच में 1000 रन बनाने वाला सचिन विश्व का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी है।

20 वर्ष की आयु से पूर्व टैस्ट मैच में 5 शतक बनाने वाला सचिन प्रथम व एकमात्र खिलाड़ी है।

सचिन ने अपना पहला टैस्ट शतक इंग्लैंड के विरुद्ध बनाया। तब उसने 119 रन बनाए और नॉट आउट रहा। पाकिस्तान के मुश्ताक मोहम्मद के बाद सचिन सबसे कम आयु का दूसरा खिलाड़ी है।

अक्टूबर 2002 में सचिन 20000 रन बना कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इतने रन बनाने वाला विश्व का प्रथम बल्लेबाज बन गया।

जुलाई, 2002 में ‘विजडन’ (लन्दन) द्वारा सचिन को ‘पीपुल्स च्वाइस’ अवार्ड दिया गया।

सचिन दुनियां का सफलतम बल्लेबाज है। 10 दिसम्बर, 2005 को सचिन 38 शतकों के साथ वन डे में सर्वाधिक 13909 रन बनाने वाला खिलाड़ी बना।

अगस्त 2004 तक सचिन ने 69 अर्द्धशतक बनाकर पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल-हक के एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक अर्द्धशतक की बराबरी कर ली। सचिन ने 339 मैचों में 69 अर्द्धशतक लगाए। जबकि इंजमाम ने 317 मैचों में 69 अर्धशतकशतक बनाए।

सचिन 38 शतक बनाकर विश्व रिकार्ड बना चुका है।

सचिन ने 339 मैचों में 13415 रन बना लिए और विश्व में एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बने, तब तक इजंमाम 317 मैचों में 9897 रन बनाकर रन बनाने के मामले में दूसरे नम्बर पर थे।

सचिन से पूर्व अजहरुद्दीन ने सर्वाधिक 334 एक दिवसीय मैच खेले थे। सचिन ने अगस्त 2004 तक 339 मैच खेल कर अजहरुद्दीन के रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया और भारत का सर्वाधिक मैच खेलने वाला खिलाड़ी बन गया।

339 मैच खेलने के बाद भी सचिन विश्व में दूसरे नम्बर का खिलाड़ी है। विश्व का सर्वाधिक एक दिवसीय मैच खेलने वाला खिलाड़ी पाकिस्तान का पूर्व कप्तान वसीम अकरम है जिसने 356 मैच खेले।

50 बार वह ‘मैन ऑफ द मैच’ का पुरस्कार जीत चुका है। यह एक रिकार्ड है।

10 दिसम्बर 2005 को सचिन ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटल मैदान पर टैस्ट मैचों में सर्वाधिक शतक (34 शतक) बनाने का सुनील गावस्कर का रिकार्ड तोड़ दिया और अपना 35वां शतक श्रीलंका के खिलाफ बनाया। इस टेस्ट मैच में उसने गावस्कर के 125 टैस्ट खेलने के रिकार्ड की भी बराबरी की।

टेस्ट मैच में दस हजार से अधिक रन बनाने वाले सचिन सबसे युवा खिलाड़ी हैं।

विज्ञापनों की दुनिया का उन्हें बादशाह कहा जाता है। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 2006 में उन्होंने आइकोनिक्स से 6 वर्ष के लिए 180 करोड़ का अनुबंध किया। इससे पूर्व उन्होंने वर्ल्ड टेल के साथ 5 वर्ष का 100 करोड़ का अनुबंध किया था।

वह वन डे में सर्वाधिक 13909 रन (दिसम्बर-2005 तक) बना चुके थे।

हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी ने वर्ष 2004 के लिए सचिन

तेंदुलकर को क्रिकेट का श्रेष्ठतम खिलाड़ी नामांकित किया।

मई 2006 तक सचिन 132 टैस्ट मैचों में 19469 रन और 362 वन डे मैचों में 14146 रन बना चुके थे।

सचिन को अक्सर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। सचिन से यह पूछे जाने पर कि उन्हें यह सुनकर कैसा लगता है, उनका कहना था- ”मैं देवता नहीं हूं। लेकिन खुशी मिलती है जब मेरे देश के लोग मुझ पर इतना भरोसा जताते हैं। मैं देश के भाई-बहनों के चेहरे पर मुस्कान ला सकूं इससे बड़ी बात क्या होगी। भगवान ने यह वरदान दिया है।

35वां शतक बनाने पर सचिन ने कहा- ”वैसे तो सभी शतक महत्त्वपूर्ण रहे हैं। मैने पहला शतक 17 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड के खिलाफ ओल्ड ट्रेफर्ड में जमाया था। पहला होने के कारण वह भी यादगार है और यह 35वां शतक भी सबसे यादगार रहेगा।” सचिन को भगवान में पूरा विश्वास है। साईं बाबा और गणपति के वह अनन्य भक्त हैं।

मदर टेरेसा की जीवनी

तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित करने वाली मदर टेरेसा ऐसे महान लोगों में से एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीती थीं। संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’था।



मदर टेरेसा का जन्म -

अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में एक अल्बेनीयाई परिवार में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।



मदर टेरेसा के पिता का निधन -

जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।



समाजसेवी मदर टेरेसा -

18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला लिया और फिर वह आयरलैंड चली गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि ‘लोरेटो’की सिस्टर्स के लिए ये जरुरी था। आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को वह कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट पंहुचीं। 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रधानाचार्या बन गईं।



एक कैथोलिक नन -

मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं। मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व ग़रीबों की स्वयं सेवा करती थीं। 1946 में गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1948 में स्वेच्छा से उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी।



मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना -

7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य समाज से बेखर और बीमार गरीब लोगों की सहायता करना था। मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिए विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मनित किया गया था।



पद्मश्री से सम्मनित -

भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मनित किया। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि गरीबों को फंड कर दी। 1985 में अमेरिका ने उन्हें मेडल आफ़ फ्रीडम से नवाजा।



अंतिम समय में रहीं परेशान -

अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा ने शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक कष्ट भी झेले क्योंकि उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए थे। उन पर ग़रीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई। उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था।



मदर टेरेसा का निधन -

मदर टेरेसा की बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी गिरता चला गया। 1983 में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के दौरान उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। 1989 में उन्हें दूसरा दिल का दौरा पड़ा और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।



उनका निधन -

उनका निधन साल 1991 में मैक्सिको में उन्हें न्यूमोनिया और ह्रदय की परेशानी हो गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।

मिल्खा सिंह की जीवनी

मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए। 1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगीता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ गया।



मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा की भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।



मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।



मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया। उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को ‘फ़्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे। इस दौड़ में जीत के पश्चात् मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात् वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।



उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे। मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात् एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।



उपलब्धियां -

1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।

टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।

जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।

1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।

1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।

1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।

वाक्य in hindi

वाक्य

वाक्य

वाक्य- एक विचार को पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह वाक्य कहलाता है।
जैसे-
1. श्याम दूध पी रहा है।
2. मैं भागते-भागते थक गया।
3. यह कितना सुंदर उपवन है।
4. ओह ! आज तो गरमी के कारण प्राण निकले जा रहे हैं।
5. वह मेहनत करता तो पास हो जाता।

ये सभी मुख से निकलने वाली सार्थक ध्वनियों के समूह हैं। अतः ये वाक्य हैं। वाक्य भाषा का चरम अवयव है।
वाक्य-खंड

वाक्य के प्रमुख दो खंड हैं-
1. उद्देश्य।
2. विधेय।

1. उद्देश्य- जिसके विषय में कुछ कहा जाता है उसे सूचकि करने वाले शब्द को उद्देश्य कहते हैं।
जैसे-
1. अर्जुन ने जयद्रथ को मारा।
2. कुत्ता भौंक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमें अर्जुन ने, कुत्ता, तोता उद्देश्य हैं; इनके विषय में कुछ कहा गया है। अथवा यों कह सकते हैं कि वाक्य में जो कर्ता हो उसे उद्देश्य कह सकते हैं क्योंकि किसी क्रिया को करने के कारण वही मुख्य होता है।

2. विधेय- उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है, अथवा उद्देश्य (कर्ता) जो कुछ कार्य करता है वह सब विधेय कहलाता है।
जैसे-
1. अर्जुन ने जयद्रथ को मारा।
2. कुत्ता भौंक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमें ‘जयद्रथ को मारा’, ‘भौंक रहा है’, ‘डाल पर बैठा है’ विधेय हैं क्योंकि अर्जुन ने, कुत्ता, तोता,-इन उद्देश्यों (कर्ताओं) के कार्यों के विषय में क्रमशः मारा, भौंक रहा है, बैठा है, ये विधान किए गए हैं, अतः इन्हें विधेय कहते हैं।
उद्देश्य का विस्तार- कई बार वाक्य में उसका परिचय देने वाले अन्य शब्द भी साथ आए होते हैं। ये अन्य शब्द उद्देश्य का विस्तार कहलाते हैं।

जैसे-
1. सुंदर पक्षी डाल पर बैठा है।
2. काला साँप पेड़ के नीचे बैठा है।
इनमें सुंदर और काला शब्द उद्देश्य का विस्तार हैं।

उद्देश्य में निम्नलिखित शब्द-भेदों का प्रयोग होता है-
(1) संज्ञा- घोड़ा भागता है।
(2) सर्वनाम- वह जाता है।
(3) विशेषण- विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है।
(4) क्रिया-विशेषण- (जिसका) भीतर-बाहर एक-सा हो।
(5) वाक्यांश- झूठ बोलना पाप है।

वाक्य के साधारण उद्देश्य में विशेषणादि जोड़कर उसका विस्तार करते हैं। उद्देश्य का विस्तार नीचे लिखे शब्दों के द्वारा प्रकट होता है-
(1) विशेषण से- अच्छा बालक आज्ञा का पालन करता है।
(2) संबंध कारक से- दर्शकों की भीड़ ने उसे घेर लिया।
(3) वाक्यांश से- काम सीखा हुआ कारीगर कठिनाई से मिलता है।
विधेय का विस्तार- मूल विधेय को पूर्ण करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है वे विधेय का विस्तार कहलाते हैं। जैसे-वह अपने पैन से लिखता है। इसमें अपने विधेय का विस्तार है।
कर्म का विस्तार- इसी तरह कर्म का विस्तार हो सकता है। जैसे-मित्र, अच्छी पुस्तकें पढ़ो। इसमें अच्छी कर्म का विस्तार है।
क्रिया का विस्तार- इसी तरह क्रिया का भी विस्तार हो सकता है। जैसे-श्रेय मन लगाकर पढ़ता है। मन लगाकर क्रिया का विस्तार है।
वाक्य-भेद

रचना के अनुसार वाक्य के निम्नलिखित भेद हैं-
1. साधारण वाक्य।
2. संयुक्त वाक्य।
3. मिश्रित वाक्य।

1. साधारण वाक्य
जिस वाक्य में केवल एक ही उद्देश्य (कर्ता) और एक ही समापिका क्रिया हो, वह साधारण वाक्य कहलाता है।
जैसे-
1. बच्चा दूध पीता है।
2. कमल गेंद से खेलता है।
3. मृदुला पुस्तक पढ़ रही हैं।

विशेष-इसमें कर्ता के साथ उसके विस्तारक विशेषण और क्रिया के साथ विस्तारक सहित कर्म एवं क्रिया-विशेषण आ सकते हैं। जैसे-अच्छा बच्चा मीठा दूध अच्छी तरह पीता है। यह भी साधारण वाक्य है।

2. संयुक्त वाक्य
दो अथवा दो से अधिक साधारण वाक्य जब सामानाधिकरण समुच्चयबोधकों जैसे- (पर, किन्तु, और, या आदि) से जुड़े होते हैं, तो वे संयुक्त वाक्य कहलाते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं।
(1) संयोजक- जब एक साधारण वाक्य दूसरे साधारण या मिश्रित वाक्य से संयोजक अव्यय द्वारा जुड़ा होता है। जैसे-गीता गई और सीता आई।
(2) विभाजक- जब साधारण अथवा मिश्र वाक्यों का परस्पर भेद या विरोध का संबंध रहता है। जैसे-वह मेहनत तो बहुत करता है पर फल नहीं मिलता।
(3) विकल्पसूचक- जब दो बातों में से किसी एक को स्वीकार करना होता है। जैसे- या तो उसे मैं अखाड़े में पछाड़ूँगा या अखाड़े में उतरना ही छोड़ दूँगा।
(4) परिणामबोधक- जब एक साधारण वाक्य दसूरे साधारण या मिश्रित वाक्य का परिणाम होता है। जैसे- आज मुझे बहुत काम है इसलिए मैं तुम्हारे पास नहीं आ सकूँगा।

3. मिश्रित वाक्य
जब किसी विषय पर पूर्ण विचार प्रकट करने के लिए कई साधारण वाक्यों को मिलाकर एक वाक्य की रचना करनी पड़ती है तब ऐसे रचित वाक्य ही मिश्रित वाक्य कहलाते हैं।
विशेष-
(1) इन वाक्यों में एक मुख्य या प्रधान उपवाक्य और एक अथवा अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं जो समुच्चयबोधक अव्यय से जुड़े होते हैं।
(2) मुख्य उपवाक्य की पुष्टि, समर्थन, स्पष्टता अथवा विस्तार हेतु ही आश्रित वाक्य आते है।

आश्रित वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-
(1) संज्ञा उपवाक्य।
(2) विशेषण उपवाक्य।
(3) क्रिया-विशेषण उपवाक्य।

1. संज्ञा उपवाक्य-
जब आश्रित उपवाक्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम के स्थान पर आता है तब वह संज्ञा उपवाक्य कहलाता है। जैसे- वह चाहता है कि मैं यहाँ कभी न आऊँ। यहाँ कि मैं कभी न आऊँ, यह संज्ञा उपवाक्य है।

2. विशेषण उपवाक्य-
जो आश्रित उपवाक्य मुख्य उपवाक्य की संज्ञा शब्द अथवा सर्वनाम शब्द की विशेषता बतलाता है वह विशेषण उपवाक्य कहलाता है। जैसे- जो घड़ी मेज पर रखी है वह मुझे पुरस्कारस्वरूप मिली है। यहाँ जो घड़ी मेज पर रखी है यह विशेषण उपवाक्य है।

3. क्रिया-विशेषण उपवाक्य- जब आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बतलाता है तब वह क्रिया-विशेषण उपवाक्य कहलाता है। जैसे- जब वह मेरे पास आया तब मैं सो रहा था। यहाँ पर जब वह मेरे पास आया यह क्रिया-विशेषण उपवाक्य है।
वाक्य-परिवर्तन

वाक्य के अर्थ में किसी तरह का परिवर्तन किए बिना उसे एक प्रकार के वाक्य से दूसरे प्रकार के वाक्य में परिवर्तन करना वाक्य-परिवर्तन कहलाता है।
(1) साधारण वाक्यों का संयुक्त वाक्यों में परिवर्तन-
साधारण वाक्य संयुक्त वाक्य
1. मैं दूध पीकर सो गया। मैंने दूध पिया और सो गया।
2. वह पढ़ने के अलावा अखबार भी बेचता है। वह पढ़ता भी है और अखबार भी बेचता है
3. मैंने घर पहुँचकर सब बच्चों को खेलते हुए देखा। मैंने घर पहुँचकर देखा कि सब बच्चे खेल रहे थे।
4. स्वास्थ्य ठीक न होने से मैं काशी नहीं जा सका। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था इसलिए मैं काशी नहीं जा सका।
5. सवेरे तेज वर्षा होने के कारण मैं दफ्तर देर से पहुँचा। सवेरे तेज वर्षा हो रही थी इसलिए मैं दफ्तर देर से पहुँचा।

(2) संयुक्त वाक्यों का साधारण वाक्यों में परिवर्तन-

संयुक्त वाक्य साधारण वाक्य
1. पिताजी अस्वस्थ हैं इसलिए मुझे जाना ही पड़ेगा। पिताजी के अस्वस्थ होने के कारण मुझे जाना ही पड़ेगा।
2. उसने कहा और मैं मान गया। उसके कहने से मैं मान गया।
3. वह केवल उपन्यासकार ही नहीं अपितु अच्छा वक्ता भी है। वह उपन्यासकार के अतिरिक्त अच्छा वक्ता भी है।
4. लू चल रही थी इसलिए मैं घर से बाहर नहीं निकल सका। लू चलने के कारण मैं घर से बाहर नहीं निकल सका।
5. गार्ड ने सीटी दी और ट्रेन चल पड़ी। गार्ड के सीटी देने पर ट्रेन चल पड़ी।

(3) साधारण वाक्यों का मिश्रित वाक्यों में परिवर्तन-
साधारण वाक्य मिश्रित वाक्य
1. हरसिंगार को देखते ही मुझे गीता की याद आ जाती है। जब मैं हरसिंगार की ओर देखता हूँ तब मुझे गीता की याद आ जाती है।
2. राष्ट्र के लिए मर मिटने वाला व्यक्ति सच्चा राष्ट्रभक्त है। वह व्यक्ति सच्चा राष्ट्रभक्त है जो राष्ट्र के लिए मर मिटे।
3. पैसे के बिना इंसान कुछ नहीं कर सकता। यदि इंसान के पास पैसा नहीं है तो वह कुछ नहीं कर सकता।
4. आधी रात होते-होते मैंने काम करना बंद कर दिया। ज्योंही आधी रात हुई त्योंही मैंने काम करना बंद कर दिया।

(4) मिश्रित वाक्यों का साधारण वाक्यों में परिवर्तन-
मिश्रित वाक्य साधारण वाक्य
1. जो संतोषी होते हैं वे सदैव सुखी रहते हैं संतोषी सदैव सुखी रहते हैं।
2. यदि तुम नहीं पढ़ोगे तो परीक्षा में सफल नहीं होगे। न पढ़ने की दशा में तुम परीक्षा में सफल नहीं होगे।
3. तुम नहीं जानते कि वह कौन है ? तुम उसे नहीं जानते।
4. जब जेबकतरे ने मुझे देखा तो वह भाग गया। मुझे देखकर जेबकतरा भाग गया।
5. जो विद्वान है, उसका सर्वत्र आदर होता है। विद्वानों का सर्वत्र आदर होता है।

वाक्य-विश्लेषण
वाक्य में आए हुए शब्द अथवा वाक्य-खंडों को अलग-अलग करके उनका पारस्परिक संबंध बताना वाक्य-विश्लेषण कहलाता है।
साधारण वाक्यों का विश्लेषण
1. हमारा राष्ट्र समृद्धशाली है।
2. हमें नियमित रूप से विद्यालय आना चाहिए।
3. अशोक, सोहन का बड़ा पुत्र, पुस्तकालय में अच्छी पुस्तकें छाँट रहा है।
उद्देश्य विधेय
वाक्य उद्देश्य उद्देश्य का क्रिया कर्म कर्म का पूरक विधेय क्रमांक कर्ता विस्तार विस्तार का विस्तार
1. राष्ट्र हमारा है - - समृद्ध -
2. हमें - आना विद्यालय - शाली नियमित
चाहिए रूप से
3. अशोक सोहन का छाँट रहा पुस्तकें अच्छी पुस्तकालय
बड़ा पुत्र है में
मिश्रित वाक्य का विश्लेषण-
1. जो व्यक्ति जैसा होता है वह दूसरों को भी वैसा ही समझता है।
2. जब-जब धर्म की क्षति होती है तब-तब ईश्वर का अवतार होता है।
3. मालूम होता है कि आज वर्षा होगी।
4. जो संतोषी होत हैं वे सदैव सुखी रहते हैं।
5. दार्शनिक कहते हैं कि जीवन पानी का बुलबुला है।
संयुक्त वाक्य का विश्लेषण-
1. तेज वर्षा हो रही थी इसलिए परसों मैं तुम्हारे घर नहीं आ सका।
2. मैं तुम्हारी राह देखता रहा पर तुम नहीं आए।
3. अपनी प्रगति करो और दूसरों का हित भी करो तथा स्वार्थ में न हिचको।
अर्थ के अनुसार वाक्य के प्रकार
अर्थानुसार वाक्य के निम्नलिखित आठ भेद हैं-
1. विधानार्थक वाक्य।
2. निषेधार्थक वाक्य।
3. आज्ञार्थक वाक्य।
4. प्रश्नार्थक वाक्य।
5. इच्छार्थक वाक्य।
6. संदेर्थक वाक्य।
7. संकेतार्थक वाक्य।
8. विस्मयबोधक वाक्य।

1. विधानार्थक वाक्य-जिन वाक्यों में क्रिया के करने या होने का सामान्य कथन हो। जैसे-मैं कल दिल्ली जाऊँगा। पृथ्वी गोल है।
2. निषेधार्थक वाक्य- जिस वाक्य से किसी बात के न होने का बोध हो। जैसे-मैं किसी से लड़ाई मोल नहीं लेना चाहता।
3. आज्ञार्थक वाक्य- जिस वाक्य से आज्ञा उपदेश अथवा आदेश देने का बोध हो। जैसे-शीघ्र जाओ वरना गाड़ी छूट जाएगी। आप जा सकते हैं।
4. प्रश्नार्थक वाक्य- जिस वाक्य में प्रश्न किया जाए। जैसे-वह कौन हैं उसका नाम क्या है।
5. इच्छार्थक वाक्य- जिस वाक्य से इच्छा या आशा के भाव का बोध हो। जैसे-दीर्घायु हो। धनवान हो।
6. संदेहार्थक वाक्य- जिस वाक्य से संदेह का बोध हो। जैसे-शायद आज वर्षा हो। अब तक पिताजी जा चुके होंगे।
7. संकेतार्थक वाक्य- जिस वाक्य से संकेत का बोध हो। जैसे-यदि तुम कन्याकुमारी चलो तो मैं भी चलूँ।
8. विस्मयबोधक वाक्य-जिस वाक्य से विस्मय के भाव प्रकट हों। जैसे-अहा ! कैसा सुहावना मौसम है।

Friday, 6 April 2018

Love stories

Kuch hum kahe….kuch tum kaho

Frndzz… Ye khna galat nhi hoga ki hum mein s bhut s ase log h…jinki zindgi mein mohabbaton ne dastak di hogi…..kuch logo ki kahaaniyo ki happy ending…ya khe…happy beginning hoti h….

Wse…aap btaiye….ajkl jb hum sochte h ki hmara pyaar ksa hoga …to ksi aakriti ubharti h apki aankho mein???…. Ldki ho to sbse Sundar ho….kooi kami na ho usme…..ghr ka kam ata ho….na ata ho to bhi chlega….pr girlfrnd ho to asi ho…jise dekhke collg ya skul k sbi ldke humse jalein…modern Mizaaj ki ho….etc etc…
Or agr boyfrnd ho to sbse zyada cute nd handsome ho…..romantic ho….or to or kuch ldkia to paise waala chahti h…………pr sbi ase nhi hote….

Ab krte h bat iss sikke k dusre phlu ki…..hum m s bhut log chahte honge ki unka pyaar sbse alg ho…sbse juda…..jisse dekhte hi ye Zameen tham jaye…..jiski baatein sunke ajib sa sukoon mile…..jiska sath hume sbse zyada psnd ho…..jiske dil mein bs hum hi ho…..or hmare dil mein bs wo hi ho…..jiski psnd hmari psnd ho….jiski naapsnd hmari naapsnd……jiski khushi hmari khushi…or jiska gham hmara gham ho….

Koi andekha anjaana hmari zindagi mein ek nayi fizaa ki trh aaye…..jiske sath rhne ka khwaab, haqikat bn jae……jiske liye hum dil-o-jaan kurbaan kr de….asi aawargi…asa deewanapan……bs us ek insaan k liye ho…..jiska humne barso intezaar kiya h……jiski bs ek muskuraahat k liye had s guzar jayein……jisko khush rkhne k liye apna dard bhula de…..jo hmara dard bin khe smjh jaye….chahe duniya uske liye kuch bhi sochti ho…pr hmari duniya hmara jahaan bs whi ho…..jiska sajda hmari rooh kre….jo hmari baato mein, hmari duaaon mein ho….jiske jism s nhi, rooh s pyaar ho humein…….

Yhi to h pyaar, ishq or mohabbat….baaki aap log mujse khi zyada behtar jaante ho.
Dosto……pyar sbi ko ho skta h ,,.,,pr sachaa pyaar or uska milna har kisi ki kismat mein nhi hota….to agr asa koi bhi apki lige mein h…..jo aapse sachaa pyaar kre….usko kbi mt khona…kbi nhi……Qki dusra moka hr kisi ko nhi milta…….
Jismo s aage ….rooh mein utrna pdta h…tb jaake aapko jo mehsus hoga….wo h sachha pyaar…..
"

Pyar ek khubsurat ehssas hota h

3 year ka bt h..Mai ek ldke ko bahut like krti thi…uska naam 'xx' h..wo v mujhe like krta tha..Hmlog ki bt facebook se start hui…Bs bt krte krte hmlog frnd bne …Wo meri bahut jyada care krta h…Aur sayad aage v krta rhega..Hmlog ka pyar care krne se start hua…Hmlog roj bt krne lge….Agr ek din v hmlog bt na kre to aisa lgta tha jaise hmara din adura ho…aise hi bt krte krte usne ek din mujhe msg kiya do u lv me….To maine kaha i like u but just frndly….I don’t lv u…Pr kahi na kahi mai v usse pyar krti thi…Again usne dusre din mujhe propose kiya …. ..To mai v khud ko rok nhi payi …Aur maine uska proposal accept kr liya…aur aaj 3 saal bd ki bt h…Aaj v wo mujhse utna hi pyar krta h …Jitna pehle krta tha….Pyar ek bahut hi khubsurat ehsaas hota h dosto..maine kvi nhi socha tha k koi mujhse itna pyar krega…"
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Pyar wali problem

mai ek ladki se bahot pyar krta hu uska naam 'xx' hai.mai abhi msc kr rha hu.wo meri classmate h 'xx' achi ldki hai bhot hi chanchal aur jyada bolne wali uska yhi nature mujhe uska diwana bana deta hai.mai jb bhi use dekhta hu mera man usse baat krne ka hota hai pr baat kr nhi pata qki iske pichhe ek story hai.ye baat tb ki hai jab hum dono bsc frst yr me the.tab maine use pehli baar dekha tha aur tb se pyar ho gya.jb wo mujhse pehli baar baat kr rhi thi to mujhe usski aankho ko dekhkr laga ki she loves me.tb maine use smile pass kiya wo hansne lagi.aur daily baat hoti thi.mai roj college jane laga bas usi ko dekhta tha.usi se baat krne ka roz man krta tha to mai usse bbaat krne lagta wo roz mere se baat krne aati thi college me chahe kahi bhi wo mera rasta rok leti thi aur baat krti uski nadaniya mujhe pasand thi.usse baat krna acha lagata tha.maine uski bhot help ki wo mere se bhot kaam krwati aur mujhe uska kaam krna acha lagta.bs meri use achi frndship chal rhi thi .mera ek dost tha jo mujhe bhot motivate krta tha.usne bola ki ja use i love u bol ke aa…

mene kosis kiya bt bol nhi paya.bhot try kiya use prpose krne ki but kr nhi paya.hmare class ka ek ldka jiska naam prakash hai wo 'xx' ko roz paresan krta tha.prkas sbko hasata tha usi comedy aj bhi class me dekhne ko milta rhta h actually prkas hmare class ka joker hai.aur bhot samajhdaar bhi hai.prkash aur 'xx' ko sath me dekhkar mujhe gussa aata tha..'xx' ne 1saal tk mujhse baat nhi kiya.prkas k sath ghul mil gyi.lekin mujhe 'xx' ki yaad aane lgi to mene kahi se uska no. Pata krke usko call kiya.to 'xx' ne kaha ki mujhe call msg na kiya kr.to mene use puchha kyo to boli ki use disturb hoti hai to mene bol diya ki thik h call bhi nhi krunga msg bhi nhi krunga.us din mera dil toot gya.aisa laga jaise 'xx' mujhe janti hi nhi me uske liye ek ajnabi bankar reh gya.ab final yr me pahuche to fir 'xx' mujhse baat krne lagi but call krke nhi only college me.hum fir se frnd bane.but yaha bhi mera badluck aa gya.humari baat nhi ho payi karib two month se.isi bich mene apni class mate 'n' se faebook pr frndship kiya aur prpose kiya but reject kr diya usne….mene mafi mangi…uske baad mene 'o' ko prpose kiya wo bhi mere class me h..'o' ne kaha hum achhe dost bankar rhenge.mene ok bol diya.mera teen baar dil toot chuka tha.'xx' se meri baat krne ki himmat na huyi.jab mai msc me aaya to 'a' naam ki ladki se fb me frndship kiya lagataar 5mahine tk 'a' se facebook pr baat kiya.'a' meri classmate hai.hmare class ki monitor hai.aur topper hai.'a' se mene apni sbhi problm share kiya 'a' achi dost thi meri hr prpoblm ko solve krti thi.lekin mene 'a' ko ek din bol diya kitum log sbka majak udate ho to wo bura maan gyi aur mujhe unfrnd kr diya ab.jab bhi mai class jata hu….

'a','n','o' se baat hi nhi kr pata….aur 'xx' meri jaan hai usse bhi baat nhi kr pata hu lekin jb bhi me 'a' ko kisi k sath baat krte dekhta hu bura lagtta hai 'xx' ko me sbse jyada like krta hu 'a' se bhi jyada.wse 'a' aur mere bich misunderstanding huyi isliye frndship toot gyi.meri life bhot dukh aur tqlif se bhari hai.koi bhi ldki mujhe like nhi krti halaki girls mere se baat to krti h.kisi ka number mere paas nhi hai.college life maja nhi aa rha h….waise ek baat batana to mai bhool gya..ek din mai facebook chala rha th to pooja naam ki ek ldki ki id dikhayi diya.mene rquest bhej diya usne 2-4 din me accept bhi kr liya.humari baat suru ho gyi ..mene uska number manag usne de diya.fir me use roz baat krne laga.jb mene use call kiya uski aawaz bhot sweet sa laga aur khushi ki baat ye h ki pooja mere hi college me padhti hai.pooja mere se hr sunady ko baat krti h jab bhi call krta hu bhot khush ho jati hai.humne ek dusre ko dekha hi nhi hai…kuuch din me pooja aur mai milne wale hai.mai pooja se frndship krna chahta hu aur hum ache frnds banne wale hai.so frnds aap bhi pyar me padkar jyada dukhi mat hona meri tarah….sbse frndship kro aur sbse jaruri baat kisi ko dil se pyar mt krna.qki jo dil se pyar krega use pyar wali problem hoti hai….aansu mat bahana jo apke aansuo k layak hi nhi h use yaad krke rona kyu?mai to ab khush hu.qki mai pooja jaisi frnd se baat krta hu jo bhot achi ldki hai.yaar kas pooja mujhe samjhe aur mai usko samjhu bs aur kuch nhi chahiye aur 'xx' hmesa meri hi rhegi chahe baat kre ya na kre.qki usko dekhkar hi mai jita hu.use dekhkar mai khush hota hu.meri life 'xx' hai.plz 'xx' mere pyar ko smjho yr.mai nhi ji skta terea bin."

Monday, 2 April 2018

Most richman's story

बिल गेट्स की कहानी

बिल गेट्स को किसी परिचय कि आवश्यकता नहीं है, वह पूरी दुनिया में अपने कार्यों से जाने जाते हैं। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ Software Company “Microsoft” की नींव भी बिल गेट्स के द्वारा ही रखी गयी है।



बिल गेट्स का परिवार -

बिल गेट्स का वास्तविक तथा पूर्ण नाम विलियम हेनरी गेट्स है। इनका जन्म 28 अक्टूबर, 1955 को वाशिंगटन के सिएटल में हुआ। इनके परिवार में इनके अतिरिक्त चार और सदस्य थे – इनके पिता विलियम एच गेट्स जो कि एक मशहूर वकील थे, इनकी माता मैरी मैक्‍सवेल गेट्स जो प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल कि सदस्य थी तथा इनकी दो बहनें जिनका नाम क्रिस्टी और लिब्बी हैं। बिल गेट्स ने अपने बचपन का भी भरपूर आनंद लिया तथा पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।



बिल गेट्स का बचपन -

उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई। जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक (जी।ई।) कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई। तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो” (tic-tac-toe) तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था। बिल गेट्स इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह सॉफ्टवेयर कोड्स किस प्रकार कार्य करते हैं।



कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रति बिल गेट्स की लगन -

इसके पश्चात गेट्स डीईसी (DEC), पीडीपी (PDP), मिनी कंप्यूटर नामक सिस्टमों में दिलचस्पी दिखाते रहे, परन्तु उन्हें कंप्यूटर सेंटर कॉरपोरेशन द्वारा ऑपरेटिंग सिस्टम में हो रही खामियों के लिए 1 महीने तक प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी समय के दौरान उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर सीसीसी के सॉफ्टवेयर में हो रही कमियों को दूर कर लोगों को प्रभावित किया तथा उसके पश्चात वह सीसीसी के कार्यालय में निरंतर जाकर विभिन्न प्रोग्रामों के लिए सोर्स कोड का अध्ययन करते रहे और यह सिलसिला 1970 तक चलता रहा। इसके पश्चात इन्फोर्मेशन साइंसेस आइएनसी। लेकसाइड के चार छात्रों को जिनमें बिल गेट्स भी शामिल थे, कंप्यूटर समय एवं रॉयल्टी उपलब्ध कराकर कोबोल (COBOL), पर एक पेरोल प्रोग्राम लिखने के लिए किराए पर रख लिया।



इसके पश्चात उन्हें रोकना नामुमकिन था। मात्र 17 वर्ष कि उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर (Intel 8008 Processor) पर आधारित यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया। 1973 में वह लेकसाइड स्कूल से पास हुए तथा उसके पश्चात बहु- प्रचलित हारवर्ड कॉलेज में उनका दाखिला हुआ। परन्तु उन्होंने 1975 में ही बिना स्नातक किए वहाँ से विदा ले ली जिसका कारण था उस समय उनके जीवन में दिशा का अभाव। उसके पश्चात उन्होंने Intel 8080 चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं कि कंपनी का आरम्भ करना चाहिए।



माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का उत्थान -

MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) जिन्होंने एक माइक्रो कंप्यूटर का निर्माण किया था, उन्होंने गेट्स को एक प्रदर्शनी में उपस्थित होने कि सहमती दी तथा गेट्स ने उनके लिए अलटेयर एमुलेटर (Emulator) निर्मित किया जो Mini Computer और बाद में इंटरप्रेटर में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा। इसके बाद बिल गेट्स व् उनके साथी को MITS के अल्बुकर्क स्थित कार्यालय में काम करने कि अनुमति दी गयी। उन्होंने अपनी जोड़ी का नाम Micro-Soft रखा तथा अपने पहले कार्यालय कि स्थापना अल्बुकर्क में ही की। 26 नवम्बर, 1976 को उन्होंने Microsoft का नाम एक व्यापारिक कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया। Microsoft Basic कंप्यूटर के चाहने वालों में सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था। 1976 में ही Microsoft MITS से पूर्णत: स्वतंत्र हो गया तथा Gates और Allen ने मिलकर कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग भाषा Software का कार्य जारी रखा। इनसे बाद Microsoft ने अल्बुकर्क में अपना कार्यालय बंद कर बेलेवुए, वाशिंगटन में अपना नया कार्यालय खोला। Microsoft ने उन्नति की ओर बढ़ते हुए प्रारंभिक वर्षों में बहुत मेहनत व् लगन से कार्य किया। गेट्स भी व्यावसायिक विवरण पर भी ध्यान देते थे, कोड लिखने का कार्य भी करते थे तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा लिखे गए व् जारी किये गए कोड कि प्रत्येक पंक्ति कि समीक्षा भी वह स्वयं ही करते थे। इसके बाद जानी मानी कंपनी IBM ने Microsoft के साथ काम करने में रूचि दिखाई, उन्होंने Microsoft से अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए बेसिक इंटरप्रेटर बनाने का अनुरोध किया। कई कठिनाइयों से निकलने के बाद गेट्स ने Seattle कंप्यूटर प्रोडक्ट्स के साथ एक समझौता किया जिसके बाद एकीकृत लाइसेंसिंग एजेंट और बाद में 86-DOS के वह पूर्ण आधिकारिक बन गए और बाद में उन्होंने इसे आईबीएम को $80,000 के शुल्क पर PC-DOS के नाम से उपलब्ध कराया। इसके पश्चात Microsoft का उद्योग जगत में बहुत नाम हुआ। 1981 में Microsoft को पुनर्गठित कर बिल गेट्स को इसका चेयरमैन व् निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया। जिसके बाद Microsoft ने अपना Microsoft Windows का पहला संस्करण पेश किया। 1975 से लेकर 2006 तक उन्होंने Microsoft के पद पर बहुत ही अदभुत कार्य किया, उन्होंने इस दौरान Microsoft कंपनी के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।



बिल गेट्स का विवाह व् आगे का जीवन -

1994 में बिल गेट्स का विवाह फ्रांस में रहने वाली Melinda से हुआ तथा 1996 में इन्होंने जेनिफर कैथेराइन गेट्स को जन्म दिया। इसके बाद मेलिंडा तथा बिल गेट्स के दो और बच्चे हुए जिनके नाम रोरी जॉन गेट्स तथा फोएबे अदेले गेट्स हैं। वर्तमान में बिल गेट्स अपने परिवार के साथ वाशिंगटन स्थित मेडिना में उपस्थित अपने सुन्दर घर में रहते हैं, जिसकी कीमत 1250 लाख डॉलर है।



बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का उदय -

वर्ष 2000 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशनकी नींव रखी जो कि पारदर्शिता से संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा Charitable फाउंडेशन था। उनका यह फाउंडेशन ऐसी समस्याओं के लिए कोष दान में देता था जो सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ कर दी जाती थीं जैसे कि कृषि, कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कॉलेज छात्रवृत्तियां, एड्स जैसी बीमारियों के निवारण हेतु, इत्यादि।



परोपकारी कार्य -

सन 2000 में इस फाउंडेशन ने Cambridge University को 210 मिलियन डॉलर गेट्स कैम्ब्रिज छात्रवृत्तियों हेतु दान किये। वर्ष 2000 तक बिल गेट्स ने 29 बिलियन डॉलर केवल परोपकारी कार्यों हेतु दान में दे दिए। लोगों की उनसे बढती हुई उम्मीदों को देखते हुए वर्ष 2006 में उन्होंने यह घोषणा की कि वह अब Microsoft में अंशकालिक रूप से कार्य करेंगे और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में पूर्णकालिक रूप से कार्य करेंगे। वर्ष 2008 में गेट्स ने Microsoft के दैनिक परिचालन प्रबंधन कार्य से पूर्णतया विदा ले ली परन्तु अध्यक्ष और सलाहकार के रूप में वह Microsoft में विद्यमान रहे।

धीरूभाई अंबानी की जीवनी

एक आदमी जो हाईस्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया। वह इतने गरीब परिवार से था कि खर्चा चलाने के लिए उसे अपनी किशोरावस्था से ही नाश्ते की रेहड़ी लगाने से लेकर पेट्रोल पंप पर तेल भरने तक का काम करना पड़ा। ऐसे लड़के ने जब एक वृद्ध के तौर पर दुनिया को अलविदा कहा तो उसकी सम्पति का मूल्य 62 हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा था। अगर आप अब भी इस शख्सशियत को नहीं पहचान पाएं तो हम बात कर रहे हैं, धीरूभाई अंबानी की। एक ऐसा सफल चेहरा जिसने हरेक गरीब को उम्मीद दी कि सफल होने के लिए पैसा नहीं नियत चाहिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो उसके लिए जोखिम उठाते हैं। धीरूभाई ने बार — बार साबित किया कि जोखिम लेना व्यवसाय का नहीं आगे बढ़ने का मंत्र है।



शुरूआती जीवन –

28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के छोटे से गांव चोरवाड़ में धीरजलाल हीरालाल अंबानी का जन्म हुआ। पिता गोर्धनभाई अंबानी एक शिक्षक थे। माता जमनाबेन एक सामान्य गृहिणी थी। धीरूभाई के चार भाई—बहन और थे। इतने बड़े परिवार का लालन—पालन करना अध्यापक गोर्धनभाई के लिए सरल काम न था। एक समय ऐसा आया कि आर्थिक परेशानियों केी वजह से धीरू भाई को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और उनकी स्कूली शिक्षा भी अधूरी रह गई। पिता की मदद करने के लिए धीरूभाई ने छोटे—मोटे काम करने शुरू कर दिए।



व्यवसायिक सफर की शुरूआत –

यह उदाहरण कि हरेक सफलता के पीछे ढेरों असफलताएं छुपी हुई होती है, धीरूभाई अंबानी पर एकदम सटीक खरी उतरती हैं। पढ़ाई छोड़ने के बाद पहले पहल धीरूभाई ने फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उन्होंने दिमाग लगाया और गांव के नजदीक स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू कर दिया। यह काम पूरी तरह आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो साल के कुछ समय तो अच्छा चलता था बाकि समय इसमें कोई खास लाभ नहीं था। धीरूभाई ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया। बिजनेस में मिली पहली दो असफलताओं के बाद उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।



नौकरी के दौरान भी बिजनेस –

धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक भाई उन दिनों यमन में नौकरी किया करते थे। उनकी मदद से धीरूभाई को भी यमन जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने शेल कंपनी के पेट्रोल पंप पर नौकरी की शुरूआत की और महज दो साल में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए। इस नौकरी के दौरान भी उनका मन इसमें कम और व्यवसाय करने के मौको की तरफ ज्यादा रहा। उन्होंने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं। दो छोटी घटनाएं बिजनेस के प्रति उनके जूनून को बयां करती हैं। यह दोनों घटनाएं उस समय की है जब वे शेल कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे थे। जहां वे काम करते थे, वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास ही एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहां चाय के लिए 1 रूपया चुकाना पड़ता था।



उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े—बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बाते करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। धीरूभाई ने अपने ही तरीके से बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा ली। जिन्होंने आगे चलकर व्हाटर्न और हावर्ड से पारम्पिरक तरीके से डिग्री लेने वाले को नौकरी पर रखा। इसी तरह दूसरी घटना उनकी पारखी नजर और अवसर भुनाने की क्षमता की ओर इशारा करती है। हुआ यूं कि उन दिनों में यमन मे चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। धीरूभाई को एहसास हुआ कि इन सिक्कों की चांदी का मूल्य सिक्कों के मूल्य से ज्यादा है और उन्होंने लंदन की एक कंपनी को इन सिक्कों को गलाकर आपूर्ति करनी शुरू कर दी। यमन की सरकार को जब तक इस बात का पता चलता वे मोटा मुनाफा कमा चुके थे। ये दोनों घटनाएं इशारा कर रही थी कि धीरूभाई अंबानी के पास एक सफल बिजनेसमैन बनने के सारे गुण हैं।



चुनौतियां और सफलता –

यमन में धीरूभाई का समय बीत रहा था कि वहां आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई और ढेरों भारतीयों को यमन छोड़ना पड़ा। इस परेशानी के आलम में धीरूभाई को भी यमन छोड़ना पड़ा। ईश्वर ने एक सफल बिजनेसमैन बनाने के लिए परिस्थितियां गढ़नी शुरू कर दी। इस नौकरी के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरी की जगह बिजनेस करने का निर्णय लिया, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत थी। धीरूभाई के पास निवेश के लिए बड़ी रकम नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने मामा त्रयम्बकलाल दामाणी के साथ मसालों और शक्कर के व्यापार की शुरूआत की। यहीं पर रिलायंस कमर्शियल कॉरर्पोरेशन की नींव पड़ी। इसके बाद रिलायंस ने सूत के कारोबार में प्रवेश किया। यहां भी सफलता ने धीरूभाई के कदम चूमे और जल्दी ही वे बॉम्बे सूत व्यपारी संघ के कर्ता—धर्ता बन गए। यह बिजनेस जोखिमों से भरा हुआ था और उनके मामा को जोखिम पसंद नहीं था इसलिए जल्दी ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। इससे रिलायंस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 1966 में रिलायंस टैक्सटाइल्स अस्तित्व में आया। इसी साल रिलायंस ने अहमदाबाद के नरोदा में टेक्सटाइल मिल की स्थापना की। विमल की ब्रांडिंग इस तरह की गई कि जल्दी ही यह घर—घर में पहचाना जाने लगा और विमल का कपड़ा बड़ा भारतीय नाम बन गया। विमल दरअसल उनके बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे का नाम था।



इन्हीं सब संघर्षों के बीच उनका विवाह कोकिलाबेन से हुआ जिनसे उन्हें दो बेटे मुकेश और अनिल तथा दो बेटियां दीप्ती और नीना हुईं। उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और रिलायंस कपड़े के साथ ही पेट्रोलियम और दूरसंचार जैसी कंपनियों के साथ भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई। इन सबके बीच धीरूभाई अंबानी पर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने और नीतियों की कमियों से लाभ कमाने के आरोप भी लगते रहे। उनके और नुस्ली वाडिया के बीच होने वाले बिजनेस घमासान पर भी बहुत कुछ लिखा गया। उनके जीवन से प्रेरित एक फिल्म गुरू बनाई गई जिसमें अभिषेक बच्चन ने उनकी भूमिका का निर्वाह किया। लगातार बढ़ते बिजनेस के बीच उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 6 जुलाई 2002 को उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके काम को बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने संभाला।

रतन टाटा की जीवनी

रतन टाटा भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में से एक हैं। रतन टाटा हजारों लाखों लोगों के लिए आदर्श है इन्होंने अपने जीवन में कड़े संघर्ष मेहनत की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है। रतन टाटा ने 1991 में टाटा ग्रुप के अध्यक्ष बने थे और 28 दिसंबर 2012 में रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की अध्यक्षता से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि रतन टाटा अभी भी टाटा ग्रुप के ट्रस्ट के अध्यक्ष बने हैं। रतन टाटा, टाटा ग्रुप के अलावा टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा टी, टाटा केमिकल्स, इंडियन होटल्स और टाटा टेलीसर्विसेज के अध्यक्ष भी रहे हैं। रतन टाटा ने अपनी अगुवाई में टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया है।



रतन टाटा का शुरुआती जीवन –

रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1935 में सूरत शहर में हुआ था। 1940 के दशक में जब रतन टाटा के माता-पिता (सोनू और नवल) एक दूसरे से अलग हुए उस समय रतन टाटा 10 साल के और उनका छोटा भाई जिमी सिर्फ 7 साल का था। इसके बाद इन दोनों भाइयों का पालन पोषण इनकी दादी नवजबाई टाटा ने किया था। मुंबई के कैंपियन स्कूल से रतन टाटा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की उसके बाद कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन से इन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की फिर इन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के साथ कॉर्नेल विश्वविद्यालय से 1962 में स्नातक की डिग्री ली। इन सबके बाद रतन टाटा ने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से 1975 में एडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम भी पूरा किया।



रतन टाटा का कैरियर –

भारत वापस आने से पहले रतन टाटा लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में जोन्स और एमोंस में थोड़े समय काम किया। रतन टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ग्रुप से की थी, टाटा ग्रुप से रतन टाटा 1961 में जुड़े थे। रतन टाटा, टाटा ग्रुप की कई कंपनियों में अपना सहयोग दे चुके थे उसके बाद 1971 में इन्हें राष्ट्रीय रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी (नेल्को) में प्रभारी निदेशक का कार्य भार सौंपा गया। इसके बाद 1981 में रतन टाटा, टाटा इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष बने। 1991 में जेआरडी टाटा ने अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया और रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। रतन टाटा ने अपनी प्रतिभा के दम पर टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंच दिया। रतन टाटा की अध्यक्षता में टाटा मोटर्स ने अपनी पहली भारतीय कार टाटा इंडिका लॉन्च की जो काफी सफल भी रही।
इसके बाद टाटा टी ने टेटली, टाटा मोटर्स ने ‘जैगुआर लैंड रोवर’ और टाटा स्टील ने ‘कोरस’ को टेक ओवर कर भारतीय बाजार में तहलका मचा दिया। दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का आईडिया भी रतन टाटा का ही था। हालाँकि बाद में इन्होंने 28 दिसंबर 2012 को टाटा समूह के सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों से सेवानिवृत्त हो गए थे और उनकी जगह 44 वर्षीय साइरस मिस्त्री को दी गई। टाटा समूह से अपने कार्यों से निवृत होने वाले रतन टाटा ने हाल ही में ईकॉमर्स कंपनी स्नैपडील, अर्बन लैडर और चाइनीज़ मोबाइल कंपनी जिओमी में भी निवेश किया है। अभी रतन टाटा प्रधानमंत्री व्यापार और उद्योग परिषद और राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता परिषद के अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त हैं।

Story of success

सफल लोगों की असफलता की कहानियां

जीवन में या किसी भी व्यवसाय (business) में सफलता प्राप्त करने के लिए लगातार सकारात्मक (positive) रहना बहुत आवश्यक है। अपने आप को उस क्षेत्र में ले जाए जहा बहुत ज्यादा मुश्किलें हो, और जहा आपकी इच्छा अनुसार कुछ नहीं हो रहा हो। हम में से ज्यादातर लोग, असफल होने पर इतने निराश हो जाते हैं कि हार मान लेते हैं। उन्हें लगता हैं कि ऐसा उनके साथ ही क्यों हुआ? लेकिन हमें यह समझना होगा कि सफलता तक पहुँचने का रास्ता असफलता की गलियों से ही गुजरता हैं। दुनिया में कोई भी सफल व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने असफलता का सामना न किया हो। अगर विश्वास न हो तो विश्व के इन सफल व्यक्तियों की असफलताओं की कहानी पढ़िए।

अब्राहम लिंकन की जीवनी

अमेरिका के 16 वाँ राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक भी स्कूल नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियों की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े। उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्याओं चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगो को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।



वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था की सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे। अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, ‘एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगो के आख मे आसु आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे की सब लोग शांति से जीवन बिताये।



1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगे।। इसी से ही लिंकन लोगो के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी मे कई बार असफलताओ का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा। लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’। यही मेरा धर्म है”।



मृत्यु -

14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला मे नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुयी।



एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।

मेजर ध्यान चंद की कहानी

हॉकी के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध मेजर ध्यान चंद बहु प्रतिष्ठित बेहतरीन हॉकी प्लेयर थे। गोल करने की उनके क्षमता अद्भुत थी और अक्सर विरोधी टीम भारत के इस खिलाडी के सामने घुटने टेकते हुए नजर आते थे। 29 अगस्त को आने वाला उनका जन्मदिन भारत में राष्ट्रिय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है और भारत के राष्ट्रपति ने भी उन्होंने राजीव गाँधी खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य अवार्ड से इस दिन सम्मानित भी किया गया है। हॉकी फील्ड में तीन ओलिंपिक मैडल जीतने वाला, भारतीय हॉकी खिलाडी ध्यान चंद बेशक हॉकी के सबसे बेहतरीन और हराफनौला खिलाडी थे। वे उस समय भारतीय अंतरराष्ट्रीय हॉकी टीम के सदस्य थे, जिस समय भारतीय हॉकी टीम ने पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया हुआ था।



एक खिलाडी के रूप में गोल करने की उनकी शैली और कला दुसरे सभी खिलाडियों से बिल्कुल अलग और अद्भुत थी। इसीलिए उन्हें “हॉकी के जादूगर” के नाम से भी जाना जाता है। हर मैच में हॉकी की गेंद पर उनकी अद्भुत पकड़ होती थी और गेंद को घसीटने में भी वे बेहतर थे। बल्कि गेंद को घसीटने की उनकी कला अविश्वसनीय थी। लोग उन्हें हॉकी की स्टिक से खेलने वाला जादूगर कहकर ही बुलाते थे। कई बार विरोधी टीम ने उनकी स्टिक को भीतर से देखने के लिए मैच के दौरान तोड़ने की भी कोशिश की थी। हॉकी के प्रति उनका प्रेम तब बढ़ने लगा था जब किशोरावस्था में ही वे आर्मी में शामिल हो चुके थे। शुरू-शुरू में आर्मी टीम की तरफ से खेलते थे, जहाँ उन्होंने अच्छा खेलकर अपना नाम भी कमाया।



जिस भारतीय टीम ने 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक और 1932 के लोंस एंजेल्स ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था, उस भारतीय टीम के कप्तान ध्यान चंद ही थे। 1932 के ओलिंपिक में भारत का पहला मैच जापान के खिलाफ था, जिसे उन्होंने 11-1 से जीता था। इससे सिद्ध हुआ की भारतीय टीम काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है और सबको यकीन था की टीम फाइनल में जाकर एक बार फिर गोल्ड मैडल जरुर जीतेंगी। ओलिंपिक के बाद भारतीय टीम ने यूनाइटेड स्टेट, इंग्लैंड और दुसरे देशो से खेलने के लिए बहुत से इंटरनेशनल टूर भी किये। टूर के अंत में, भारत खेले गये 37 मैचों में से 34 जीता था। इस टूर में चंद ने भारत द्वारा किये गये 338 गोल में से 133 गोल दागे थे। 1934 में उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया और अपने अपनी कप्तानी में टीम को 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में ले गये। वहा भी उन्होंने अपना जादू दिखाया और भारत को तीसरा ओलिंपिक गोल्ड मैडल जीताया। 1940 के अंत तक वे लगातार हॉकी खेलते रहे और फिर इसके बाद 1956 में आर्मी के मेजर के रूप में सेवानिर्वृत्त हुए। सेवानिर्वृत्त होने के बाद वे भारतीय टीम के कोच बने।



अंतिम दिन -

1956 में, 51 साल की उम्र में मेजर के पद पर कार्य करते हुए वे सेवानिर्वृत्त हुए। इसके बाद उसी साल भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण देकर सम्मानित किया। सेवानिर्वृत्ति के बाद वे राजस्थान के माउंट अबू में कोच का काम करने लगे। बाद में उन्होंने पटियाला के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट के मुख्य हॉकी कोच होने के पद को स्वीकार किया और कई सालो तक उसी पद रहते हुए काम भी किया। चंद ने अपने अंतिम दिन अपने गाँव झाँसी, उत्तर प्रदेश, भारत में बिताए थे। मेजर ध्यान चंद की मृत्यु 3 दिसम्बर 1979 को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, दिल्ली में हुई। झाँसी के शहीदों के मैदान पर उनका दाह संस्कार किया गया था।



मेजर ध्यान चंद को मिले हुए अवार्ड और उपलब्धियाँ –

• वे उन तीनो भारतीय टीम के सदस्य थे जिन्होंने 1928, 1932 और 1936 के ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था। अपने पुरे हॉकी करियर में उन्होंने तक़रीबन 1000 से भी ज्यादा गोल किये थे, जिनमे से 400 उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये थे।

• 1956 में हॉकी फील्ड में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च अवार्ड पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

किसी भी खिलाडी की महानता को गिनने का सबसे का पैमाना यही है की उस खिलाडी के साथ कितनी घटनाये जुडी हुई है। उस हिसाब से तो मेजर ध्यान चंद का कोई जवाब ही नही। हौलेंड में तो लोगो ने उनकी हॉकी स्टिक तुडवा कर भी देख ली थी के कही उसमे चुम्बक तो नही। यही घटना हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता को दर्शाती है। वक्त अगर किसी चीज को लौटाना चाहे तो बेशक भारतीय खेल जगत मेजर ध्यानचंद को मांगना चाहेगा। उनसा न कोई हुआ और हो सकता है और ना भविष्य में कोई होंगा। खेल से खिलाड़ी की पहचान बनती है लेकिन ध्यानचंद तो हॉकी का आइना बन गए।

सचिन तेंदुलकर की जीवनी

सचिन तेंदुलकर ने समय के साथ रनों का अम्बार लगा दिया है। उन्होंने 29 जून, 2007 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध बेलाफास्ट (आयरलैंड) में खेलते हुए एक दिवसीय मैचों में 15000 रन पूरे कर लिए। इतने रन बनाने के बाद सचिन। विश्व के ऐसे प्रथम खिलाड़ी बन गए, जिंन्होंने इतने बड़े आंकड़े को छुआ है। विश्व के श्रेष्ठतम बल्लेबाज माने जाने वाले आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन ने एक बार सचिन के बारे में कहा था- ”मैंने उसे टीवी पर खेलते हुए देखा और उसकी खेल तकनीक देखकर दंग रह गया। तब मैंने अपनी पत्नी को अपने पास बुला कर उसे देखने को कहा। हालांकि मैंने स्वयं को खेलते हुए कभी नही देखा, लेकिन मुझे महसूस होता है कि यह खिलाड़ी ठीक वैसा ही खेलता है जैसा मैं खेलता था।” वास्तव में सचिन क्रिकेट का हीरो और एक ऐसा रोल मॉडल है जिसे सभी भारतीय पसन्द करते हैं। कल की सी बात लगती है जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट क्षेत्र में उतरा-एक घुंघराले बालों वाला 15 वर्षीय सचिन, जिसकी भर्राई सी आवाज ने लोगों के दिल में स्थान बना लिया।



वह लगभग 15 वर्ष का ही था जब उसने 1988 में स्कूल के क्रिकेट मैच में काम्बली के साथ 664 रन बनाए थे। लोग उसके खेल का करिश्माई अंदाज़ देखते ही रह गए थे। इसके बाद उसका क्रिकेट के मैदान में अन्तरराष्ट्रीय मैचों में प्रदर्शन इतना अच्छा रहा है कि लोग कहते हैं कि वह वाकई लाजवाब है। सचिन तेंदुलकर ने 1989-90 में कराची में पाकिस्तान के विरुद्ध अपना पहला टैस्ट मैच खेल कर अपने क्रिकेट कैरियर की शुरुआत की थी। तब से अब तक के कैरियर में सचिन ने उन ऊंचाइयों को छू लिया है, जिसे छूना किसी अन्य क्रिकेट खिलाड़ी के लिए शायद ही सम्भव हो सके। आक्रामक बल्लेबाजी उसका अंदाज है। उसका बल्ला यूं घूमता है कि दर्शकों को अचम्भित कर देता है। यदि वह जल्दी आउट भी हो जाता है तो भी अक्सर अपना करिश्मा दिखा ही जाता है। गेंदबाजी में भी वह अपना करिश्मा कभी-कभी दिखा देता है। एक दिवसीय मैचों में दस हजार से अधिक रन बनाने वाला वह पहला बल्लेबाज है। उसने सौ से अधिक विकेट लेने का करिश्मा भी दर्शकों को दिखाया है। सचिन ने दर्शकों के मानस पटल पर अपने खेल की अविस्मरणीय छाप छोड़ी है।



उसने 20 टैस्टों और एक दिवसीय मैचों में अनेकों शतक व हजारों रन बना डाले हैं जितने आज तक कोई नहीं बना सका है। जब सचिन केवल 11 वर्ष का था, तब वह बेहद शैतान था। मां-बाप को वह अपनी शैतानियों से परेशान करता रहता था। एक बार वह शैतानी करते हुए पेड़ से गिर गया। तब सचिन के बड़े भाई अजीत के दिमाग में विचार आया कि उसे क्रिकेट की कोचिंग क्लास के लिए भेज दिया जाए ताकि उसकी अतिरिक्त ऊर्जा खेलों में खर्च हो सके। कहा जा सकता है कि यह सचिन की अतिविशिष्ट जिन्दगी की शुरुआत थी। आज सचिन 100 टैस्ट मैच खेलने वाला विश्व का 17वां खिलाड़ी बन चुका है। सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मैच खेला था। तब सचिन केवल 16 वर्ष का था और प्रथम पारी में वह बहुत ही नर्वस व घबराया हुआ था। सचिन को तब यूं महसूस हुआ था कि शायद वह जिन्दगी में आगे अन्तरराष्ट्रीय मैच और नहीं खेल सकेगा। अकरम और वकार की तेज गेंदों के सामने वह केवल 15 रन ही बना सका था। लेकिन दूसरे टेस्ट में जब उसे खेलने का मौका मिला तब उसने 59 रन बना लिए और उसके भीतर आत्मविश्वास जाग उठा। सचिन देखने में सीधा-सादा इंसान है। वह अति प्रसिद्ध हो जाने पर भी नम्र स्वभाव का है। वह अपने अच्छे व्यवहार का श्रेय अपने पिता को देता है। उसका कहना है- ”मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता के कारण हूँ। उन्होंने मुझ में सादगी और ईमानदारी के गुण भर दिए हैं। वह मराठी साहित्य के शिक्षक थे और हमेशा समझाते थे कि जिन्दगी को बहुत गम्भीरता से जीना चाहिए। जब उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा नहीं, क्रिकेट मेरे जीवन का हिस्सा बनने वाली है, उन्होंने उस बात का बुरा नहीं माना। उन्होंने मुझसे कहा कि ईमानदारी से खेलो और अपना स्तर अच्छे से अच्छा बनाए रखो। मेहनत से कभी मत घबराओ।” सचिन को भारतीय क्रिकेट टीम का कैप्टन बनाया गया था, परन्तु 2000 में उन्होंने मोहम्मद अजहरूद्‌दीन के आने के बाद वह पद छोड़ दिया।



सचिन, जिसे सुपर स्टार कहा जाता है, जीनियस कहा जाता है, जिसका एह-एक स्ट्रोक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, अपने पुराने मित्रों को आज भी नहीं भूला है चाहे वह विनोद काम्बली हो या संजय मांजरेकर। जब मुम्बई की टीम में सचिन ने खेलना आरम्भ किया था तो संजय ने राष्ट्रीय टीम की ओर से खेला था। ये दोनों पुराने मित्र हैं। क्रिकेट के अतिरिक्त सचिन को संगीत सुनना और फिल्में देखना पसन्द है। सचिन क्रिकेट को अपनी जिन्दगी और अपना खून मानते हैं। क्रिकेट के कारण प्रसिद्धि पा जाने पर वह किस चीज का आनन्द नहीं ले पाते-यह पूछने पर वह कहते हैं कि दोस्तों के साथ टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलना याद आता है। 29 वर्ष और 134 दिन की उम्र में सचिन ने अपना 100वां टैस्ट इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला। 5 सितम्बर, 2002 को ओवल में खेले गए इस मैच से सचिन 100वां टैस्ट खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बन गया। सचिन के क्रिकेट खेल की औपचारिक शुरुआत तभी हो गई जब 12 वर्ष की उम्र में क्लब क्रिकेट (कांगा लीग) के लिए उसने खेला। सचिन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का ब्रांड एम्बेसडर बना है। एम. आर. एफ. टायर, पेप्सी, एडिडास, वीजा मास्टर कार्ड, फिएट पैलियो जैसी नामी कम्पनियों ने उसे अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया। बड़ी कम्पनियों में विज्ञापन के लिए उसकी सबसे ज्यादा मांग है। 1995 में सचिन ने 70 लाख पचास हजार (7.5 मिलियन) डालर का वर्ल्ड टेल कम्पनी के साथ 5 वर्षीय अनुबंध किया। इससे सचिन विश्व का सबसे धनी क्रिकेट खिलाड़ी बन गया। इसके पूर्व ब्रायनलारा ने ब्रिटेन की कम्पनी के साथ सर्वाधिक 10 लाख 20 हजार डॉलर का अनुबंध किया था। सचिन ने 2002 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।



अन्तरराष्ट्रीय मैचों में 20000 रन बनाने वाला वह एकमात्र खिलाड़ी बन गया है। उसने 102 टेस्ट मैचों में खेली गई 162 पारी में 8461 रन बनाने के अतिरिक्त 300 एक दिवसीय मैचों में 11544 रन बनाने का रिकार्ड स्थापित किया है। उसके बारे में कहा जाता है वह विवियन रिचर्ड, मार्क वा, ब्रायन लारा सब को मिलाकर एक है। तेंदुलकर मानो एक आदमी की सेना है। वह शतक बनाता है, उसे गेंद दे दो, वह विकेट ले लेता है, वह टीम के अच्छे फील्डरों में से एक है। हम भाग्यशाली हैं कि वह भारतीय हैं। 25 मई, 1995 को सचिन ने डाक्टर अंजलि मेहता से विवाह कर लिया। उनके दो बच्चे हैं। बड़ी बच्ची का नाम ‘सराह’ है जिसका अर्थ है कीमती। छोटा बच्चा बेटा है। सचिन की अंजलि से 1990 में मुलाकात हुई। सचिन ने एक बार इंटरव्यू में कहा था- ”मुझे उससे प्यार इसलिए हो गया क्योंकि उसके गाल गुलाबी हो उठते हैं।” सचिन का पूरा नाम सचिन रमेश तेंदुलकर है। उसका नाम उसके माता-पिता ने अपने पंसदीदा संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा। सचिन ने अपना पहला साक्षात्कार दादर के एक ईरानी रेस्टोरेंट में अपने बड़े भाई से दिलवाया था क्योंकि तब उसमें अधिक आत्मविश्वास नहीं था। सचिन को बचपन में क्रिकेट से कोई विशेष लगाव न था। क्रिकेट में शामिल होने पर वह तेज गेंदबाज बनना चाहता था, इसलिए डेनिस लिली से प्रशिक्षण के लिए एम. आर. एफ. पेस एकेडमी में गया। तब उसे बताया गया कि उसे बल्लेबाजी पर ध्यान लगाना चाहिए। सचिन को अपनी मां के हाथ का भोजन बहुत पसन्द है विशेषकर सी-फूड। इस कारण उसके आने पर वह विशेष रूप से मछली मंगवाती है।



सचिन के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य -

मात्र बारह वर्ष की उम्र में सचिन ने क्लब क्रिक्रेट (कांगा लीग) मे खेलना शुरू किया।

बाम्बे स्कूल क्रिकेट टूर्नामेट में अपना पहला शतक 1936 में बनाया। फिर अगले वर्ष स्कूल क्रिकेट में 1200 रन बनाए जिनमें दो तिहरे शतक भी शामिल थे।

1988-89 में सचिन ने रणजी ट्राफी में बम्बई की तरफ से खेला और शतक बनाया। वह बम्बई की तरफ से खेलने वाला अब तक का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। अगले वर्ष वह ईरानी ट्राफी के लिए टीम में शामिल हुआ और 103 रन बनाए। उसके पश्चात् दलीप ट्राफी में शामिल होने पर पश्चिमी जोन की ओर पूर्वी जोन के विरुद्ध 151 रन बनाए। इस प्रकार तीनों देशीय टूर्नामेंट में प्रथम बार भाग लेने पर शतक लगाने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी बन गया।

जब सचिन और विनोद काम्बली ने मिल कर सेट जेवियर्स के विरुद्ध शारदाश्रम के 664 रन बनाए तब किसी भी क्रिकेट खेल के लिए यह विश्व रिकार्ड बन गया। इसमें सचिन ने 326 नाट आउट का स्कोर बनाया। फिर बाम्बे क्रिकेट की ओर से उसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी घोषित किया गया।

1991 में 18 वर्ष की आयु में सचिन यार्कशायर का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रथम खिलाड़ी बना। उस वर्ष उसे ‘वर्ष का क्रिकेटर’ चुना गया।

1992 में वह पहला खिलाड़ी बना जिसे तीसरे अम्पायर द्वारा आउट करार दिया गया।

सचिन ने अपने खेल की शुरुआत से लगातार हर टैस्ट मैच खेला और लगातार 84 टैस्ट खेले।

सचिन 29 वर्ष 134 दिन की आयु में 100वां टैस्ट मैच खेलने वाला सबसे कम आयु का खिलाड़ी बना।

सचिन का पहला टैस्ट 1989 में कराची में हुआ जो कपिल का 100 वां टैस्ट मैच था।

जिन खिलाड़ियों ने 100 या अधिक टैस्ट मैच खेले हैं, उनमें सचिन का औसत सर्वाधिक है यानी 57।99। जब कि उसके बाद मियादाद का 57।57 है और गावस्कर का (51।12)।

‘राजीव गाधी खेल रत्न’ पुरस्कार पाने वाला वर्ष 2006 तक सचिन एकमात्र क्रिकेटर हैं।

1992 में 19 वर्ष की आयु में टैस्ट मैच में 1000 रन बनाने वाला सचिन विश्व का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी है।

20 वर्ष की आयु से पूर्व टैस्ट मैच में 5 शतक बनाने वाला सचिन प्रथम व एकमात्र खिलाड़ी है।

सचिन ने अपना पहला टैस्ट शतक इंग्लैंड के विरुद्ध बनाया। तब उसने 119 रन बनाए और नॉट आउट रहा। पाकिस्तान के मुश्ताक मोहम्मद के बाद सचिन सबसे कम आयु का दूसरा खिलाड़ी है।

अक्टूबर 2002 में सचिन 20000 रन बना कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इतने रन बनाने वाला विश्व का प्रथम बल्लेबाज बन गया।

जुलाई, 2002 में ‘विजडन’ (लन्दन) द्वारा सचिन को ‘पीपुल्स च्वाइस’ अवार्ड दिया गया।

सचिन दुनियां का सफलतम बल्लेबाज है। 10 दिसम्बर, 2005 को सचिन 38 शतकों के साथ वन डे में सर्वाधिक 13909 रन बनाने वाला खिलाड़ी बना।

अगस्त 2004 तक सचिन ने 69 अर्द्धशतक बनाकर पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल-हक के एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक अर्द्धशतक की बराबरी कर ली। सचिन ने 339 मैचों में 69 अर्द्धशतक लगाए। जबकि इंजमाम ने 317 मैचों में 69 अर्धशतकशतक बनाए।

सचिन 38 शतक बनाकर विश्व रिकार्ड बना चुका है।

सचिन ने 339 मैचों में 13415 रन बना लिए और विश्व में एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बने, तब तक इजंमाम 317 मैचों में 9897 रन बनाकर रन बनाने के मामले में दूसरे नम्बर पर थे।

सचिन से पूर्व अजहरुद्दीन ने सर्वाधिक 334 एक दिवसीय मैच खेले थे। सचिन ने अगस्त 2004 तक 339 मैच खेल कर अजहरुद्दीन के रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया और भारत का सर्वाधिक मैच खेलने वाला खिलाड़ी बन गया।

339 मैच खेलने के बाद भी सचिन विश्व में दूसरे नम्बर का खिलाड़ी है। विश्व का सर्वाधिक एक दिवसीय मैच खेलने वाला खिलाड़ी पाकिस्तान का पूर्व कप्तान वसीम अकरम है जिसने 356 मैच खेले।

50 बार वह ‘मैन ऑफ द मैच’ का पुरस्कार जीत चुका है। यह एक रिकार्ड है।

10 दिसम्बर 2005 को सचिन ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटल मैदान पर टैस्ट मैचों में सर्वाधिक शतक (34 शतक) बनाने का सुनील गावस्कर का रिकार्ड तोड़ दिया और अपना 35वां शतक श्रीलंका के खिलाफ बनाया। इस टेस्ट मैच में उसने गावस्कर के 125 टैस्ट खेलने के रिकार्ड की भी बराबरी की।

टेस्ट मैच में दस हजार से अधिक रन बनाने वाले सचिन सबसे युवा खिलाड़ी हैं।

विज्ञापनों की दुनिया का उन्हें बादशाह कहा जाता है। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 2006 में उन्होंने आइकोनिक्स से 6 वर्ष के लिए 180 करोड़ का अनुबंध किया। इससे पूर्व उन्होंने वर्ल्ड टेल के साथ 5 वर्ष का 100 करोड़ का अनुबंध किया था।

वह वन डे में सर्वाधिक 13909 रन (दिसम्बर-2005 तक) बना चुके थे।

हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी ने वर्ष 2004 के लिए सचिन

तेंदुलकर को क्रिकेट का श्रेष्ठतम खिलाड़ी नामांकित किया।

मई 2006 तक सचिन 132 टैस्ट मैचों में 19469 रन और 362 वन डे मैचों में 14146 रन बना चुके थे।

सचिन को अक्सर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। सचिन से यह पूछे जाने पर कि उन्हें यह सुनकर कैसा लगता है, उनका कहना था- ”मैं देवता नहीं हूं। लेकिन खुशी मिलती है जब मेरे देश के लोग मुझ पर इतना भरोसा जताते हैं। मैं देश के भाई-बहनों के चेहरे पर मुस्कान ला सकूं इससे बड़ी बात क्या होगी। भगवान ने यह वरदान दिया है।

35वां शतक बनाने पर सचिन ने कहा- ”वैसे तो सभी शतक महत्त्वपूर्ण रहे हैं। मैने पहला शतक 17 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड के खिलाफ ओल्ड ट्रेफर्ड में जमाया था। पहला होने के कारण वह भी यादगार है और यह 35वां शतक भी सबसे यादगार रहेगा।” सचिन को भगवान में पूरा विश्वास है। साईं बाबा और गणपति के वह अनन्य भक्त हैं।

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मलाई कुल्फी

दूध और सूखे मेवे से बनी मलाई कुल्फी का लाज़बाव स्वाद बच्चों और बडे दोनों को पसंद आता है. बच्चों के लिये इस कुल्फी को कुल्फी मोल्ड में भी बनाया जा सकता है.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Malai Kulfi

फूल क्रीम दूध - 1 लीटर
पाउडर चीनी - ½ कप (80-90)ग्राम
काजू - 8-10
छोटी इलायची - 4
पिस्ते - 10-12

विधि - How to make Malai Kulfi

सबसे पहले दूध को गरम करने के लिए एक भारी तले वाले बर्तन में डाल दीजिए, और दूध में उबाल आने दीजिये.

काजू को छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर तैयार कर लीजिये. पिस्ते को पतले टुकड़ों में काट लीजिये. छोटी इलाइची को छील कर दरदरा पाउडर बना लीजिये. 

दूध में उबाल आने के बाद दूध को हर 1-2 मिनिट में चमचे को बर्तन के तले तक ले जाते हुये चलाते हुये, गाढ़ा होने और दूध को आधा रहने तक पकाते रहिये, दूध के आधा रहने के बाद कटे हुये काजू और पिस्ते डालकर मिला दीजिए, दूध को थोड़ा और गाढा़ होने दीजिये, इलायची पाउडर और पाउडर चीनी डाल कर मिक्स कर लीजिए और दूध 1-2 मिनिट तक थोडा़ उबाल लीजिये 

दूध को गैस से उतार दीजिए तथा दूध को ठंडा होने के लिए रख दीजिए. दूध के ठंडा हो जाने पर इसे कंटेनर में डाल कर, ढककर फ्रिजर में 6-8 घंटों के लिए जमने के लिए रख दीजिए.

कुल्फी के जमने पर इसे फ्रिजर से निकाल कर लीजिए और ठंडी ठंडी कुल्फी को 10 मिनिट के अन्दर ही सर्व कीजिये और खाइये.

सुझाव:

मलाई कुल्फी बनाने में दुध उबालते समय दूध को अच्छी तरह चलाते हुये गाढ़ा करना है, दूध बर्तन के तले में लगे नही, वरना कुल्फी का स्वाद खराब हो जायेगा.

फालूदा

गर्मियों की दोपहर या रात को खाने के बाद यदि फालूदा कुल्फी का एक गिलास खा लिया जाय तो फिर बाद में और कुछ खाने को मन ही नही करेगा. आईये आज दिल, दिमाग और शरीर को तृप्त कर देने वाली फालूदा कुल्फी (Falooda Kulfi) बनायें

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Falooda Kulfi

कुल्फी -
गुलाब का शर्बत
कुटी हुई बर्फ
चीनी- 2 कप (400 ग्राम)
कार्न फ्लोर -1 कप (100 ग्राम)
तुकमारिया या सब्जा के बीज 1 चम्मच
फुल क्रीम दूध 1 लीटर (रबडी बनाने के लिये)

विधि - How to make Falooda Ice Cream at home

फालूदा बनाने के लिये हमें मीठा शरबत, फालूदा सेव, भीगे हुये तुकमारिया के बीज, कुटी हुई बर्फ, रबड़ी, कुल्फी और गुलाब का शरबत चाहिये. गुलाब के शर्बत न हो तो रूह अफजा या गुलाब के एसेंस का भी प्रयोग कर सकते हैं. कुल्फी की जगह आप वनीला आइसक्रीम भी प्रयोग कर सकते हैं. फालूदा सेव बनाने की जगह सिवईयां को उबाल कर प्रयोग कर सकते हैं लेकिन जितना समय और मेहनत लगती है उतने ही समय में फालूदा सेव तैयार हो जाते हैं, जो बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं.

तुकमारिया (Tukmaria) के बीज को सब्जा (Sabja), बबईया, बबुई तुलसी (Babui) या मीठी तुलसी (Sweet Basil) भी कहा जाता है. गर्मियों में होने वाले पेट और श्वसन संबन्धी विकारों के लिये इनका बहुत महत्व है. तुकमारिया के बीज (Tukmaria or Tukhm-e-Rehan) पंसारी की बड़ी दुकानों पर मिल जाते हैं. आईये

कुल्फी - Kulfi for Falooda Ice Cream

कुल्फी आइसक्रीम जमा कर तैयार कर लीजिये या वनीला आइसक्रीम ले लीजिये How to make Kulfi at home

तुकमारिया या सब्जा के बीज - Tukariya (Sabja) for Falooda

आधा कप पानी में 1 छोटी चम्मच चम्मच तुकमारिया (Tukmaria or Sabja Seeds) - बीज डाल कर भिगा दीजिये, 1 घंटे में ये बीज फूल कर भूरे हो जाते हैं.

चीनी का सादा शरबत How to make sharbat for Falooda Kulfi

400 ग्राम चीनी को 3/4 कप पानी में मिला कर, किसी बर्तन में डालिये और गरम करने के लिये गैस पर रखिये, पानी में उबाल आने के बाद और चीनी के घुलने के बाद, 2-3 मिनिट पकाइये और गैस बन्द कर दीजिये. शरबत को ठंडा होने पर छान लीजिये.

फालूदा सेव - How to make falooda sev

1 कप कार्न फ्लोर को 2 1/2 कप पानी डालकर अच्छी तरह मिलाइये, गुठलियां न रहने पर घोल को किसी बर्तन में डालिये और चमचे से चलाते हुये मध्यम आग पर, घोल के अच्छी तरह गाड़े और पारदर्शक होने तक पका लीजिये. मिश्रण को गरम गरम ही कलछी की सहायता से सेव मशीन में डालिये. 

दूसरे बर्तन में बर्फ डाला हुआ ठंडा पानी लीजिये, सेव मशीन को दबाइये और मशीन से निकलते हुये सेव को सीधे बर्फ के ठंडे पानी में डालिये, सारे मिश्रण से सेव बना कर ठंडे पानी में डालिये, 5- 10 मिनिट तक सैट होने दीजिये, फालूदा प्रयोग में लाते समय, फालूदा सेव को चमचे से पानी से निकाल लीजिये और फालूदा आइस क्रीम में डालिये.

रबड़ी - How to make Rabdi for Falooda

फुल क्रीम दूध - 1 लीटर ( 5 कप) दूध को किसी बर्तन में डालकर उबालने रखिये और दूध में उबाल आने के बाद गैस धीमी कर दीजिये, धीमी आग पर दूध को थोड़ी थोड़ी देर में चलाते हुये, आधा रहने तक पका लिजिये, यानि कि दूध गाड़ा होकर, 5 कप दूध का 2 1/2 कप दूध ही रह जायेगा. आप चाहें तो 1 कप दूध में, 250 ग्राम खोया मिलाकर, किसी बर्तन में डालकर पका कर, जल्दी से गाड़ी रबड़ी बना सकते है. 

फालूदा आइस क्रीम में लगने वाली ये चीजें हमें पहले से तैयार करली है. फालूदा आइस क्रीम को सजाने के लिये गुलाब शरबत भी ले लीजिये.

फालूदा आइस क्रीम बनायें - Making Falooda at home

फालूदा आइस क्रीम बनाने के लिये प्याली या गिलास जो भी आपको पसन्द हो ले लीजिये और सारी 7 चीजें क्रम से डालिये. 

गिलास में सबसे पहले 2 चम्मच कुटी बर्फ डालिये

1 बड़ी चम्मच शरबत डालिये.
2 बड़ी चम्मच फालूदा सेव डालिये.
1 छोटी चम्मच तुकमारिया के फूले हुये बीज डालिये
1 बड़ी चम्मच रबड़ी डालिये.
2 स्कूप कुल्फी आइसक्रीम रखिये.
गुलाब शरबत डाल कर सजाइये.

लाजबाव फालूदा आइसक्रीम तैयार है. स्वादिष्ट फालूदा आइस क्रीम परोसिये और खाइये. 
इस सामग्री से 10 गिलास फालूदा आइसक्रीम के बनाये जा सकते हैं.

आमखन्ड

श्रीखन्ड (Shrikhand) बनाने में सबसे आसान लेकिन स्वाद में एकदम लाजवाब. श्रीखन्ड में आम का स्वाद उसे और भी अधिक स्वादिष्ट बना देता है. आईये आज आम का श्रीखंड (Mango Shrikhand) आमखंड बनाये.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Mango Shrikhand

ताजा दही - 2 1/2 कप (500 ग्राम)
पाउडर चीनी - 1/4 कप
आम का पल्प - 1 कप
काजू या बादाम - 4
पिस्ता - 5-6
इलाइची - 2

विधि - How to Make Mango Shrikhand

दही को किसी मोटे कपड़े में डाल कर, बांध कर लटका दीजिये, दही का सारी पानी निकल जाय और दही एक दम गाड़ा हो जाय, तब उसे कपड़े से निकाल कर प्याले में डालिये.

काजू या बादाम को छोटे बारीक पतले टुकड़े में काट लीजिये, इलाइची छील कर कूट लीजिये और पिस्ते भी बारीक काट लीजिये. 

बांधे हुये दही में पाउडर चीनी, आम का पल्प, आधे बादाम, पिस्ते और काजू और इलाइची डाल कर मिला दीजिये, आम खन्ड को छोटे प्यालियों में डालिये और पिस्ते, बादाम डालकर सजा दीजिये. 

आम खन्ड के प्याले फ्रिज में रखकर ठंडा कीजिये, खाना खाने के बाद ठंडा ठंडा आम खन्ड परोसिये और खाइये.

सुझाव:

बांधे हुये दही में, अनन्नास पल्प, लीची पल्प, स्ट्रावेरी पल्प जो आपको पसन्द हो मिलाकर नये स्वाद में श्रीखन्ड (Srikhand) बनाइये, परोसिये और खाइये.