Friday, 30 March 2018

3 most important essay Netaji, Sardar Patel &Mahtma Gandhiji

नेताजी सुभाषचंद्र बोस

23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाषचन्द्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावतीदेवी के यहां हुआ।

उनके पिता ने अंगरेजों के दमनचक्र के विरोध में 'रायबहादुर' की उपाधि लौटा दी। इससे सुभाष के मन में अंगरेजों के प्रति कटुता ने घर कर लिया। अब सुभाष अंगरेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का आत्मसंकल्प ले, चल पड़े राष्ट्रकर्म की राह पर।

आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद सुभाष ने आईसीएस से इस्तीफा दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- 'जब तुमने देशसेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।'

दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने कहा था - मेरी यह कामना है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है। हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा।

16 मार्च 1939 को सुभाष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में 'भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन' के साथ हुई।

5 जुलाई 1943 को 'आजाद हिन्द फौज' का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।

12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्र दास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- 'अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान मांगती है। आप मुझे खून दो, मैं आपको आजादी दूंगा।' यही देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाला, भारत मां का दुलारा सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया। 

लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को हुआ था। सरदार पटेल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आजार भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान था, जिसके कारण उन्हें भारत का लौह पुरुष भी कहा जाता है।
31 अक्टूबर 1875 गुजरात के नाडियाद में सरदार पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने तीन भाई बहनों में सबसे छोटे और चौथे नंबर पर थे।
शिक्षा : सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का प्रमुख स्त्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की और उसके बाद पुन: भारत आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की।
स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी : सरदार पटेल ने माहात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। सरदार पटेल द्वारा इस लड़ाई में अपना पहला योगदान खेड़ा संघर्ष में दिया गया, जब खेड़ा क्षेत्र सूखे की चपेट में था और वहां के किसानों ने अंग्रेज सरकार से कर में छूट देने की मांग की। जब अंग्रेज सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, तो सरदार पटेल, महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्ररित किया। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को कर में राहत दे दी गई।
सरदार पटेल नाम यूं पड़ा :  सरदार पटेल को सरदार नाम, बारडोली सत्याग्रह के बाद मिला, जब बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें पह ले बारडोली का सरदार कहा गया। बाद में सरदार उनके नाम के साथ ही जुड़ गया।
योगदान : आजादी के बाद ज्यादातर प्रांतीय समितियां सरदार पटेल के पक्ष में थीं। गांधी जी की इच्छा थी, इसलिए सरदार पटेल ने खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से दूर रखा और जवाहर लाल नेहरू को समर्थन दिया। बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री और ग्रहमंत्री का पद सौंपा गया, जिसके बाद उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों तो भारत में शामिल करना था। इस कार्य को उन्होंने बगैर किसी बड़े लड़ाई झगड़े के बखूबी किया। परंतु हैदराबाद के ऑपरेशन पोलो के लिए सेना भेजनी पड़ी।
चूंकि भारत के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें भारत का लौह पुरूष कहा गया। 15 दिसंबर 1950 को भारत का उनकी मृत्यु हो गई और यह लौह पुरूष दुनिया को अलविदा कह गया।

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेता और 'राष्ट्रपिता' माना जाता है। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थीं। मोहनदास अपने पिता की चौथी पत्नी की अंतिम संतान थे।
गांधी जी और परिवार- गांधी की मां पुतलीबाई अत्यधिक धार्मिक थीं। उनकी दिनचर्या घर और मन्दिर में बंटी हुई थी। वह नियमित रूप से उपवास रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा सुश्रुषा में दिन-रात एक कर देती थीं। मोहनदास का लालन-पालन वैष्णव मत में रमे परिवार में हुआ और उन पर कठिन नीतियों वाले जैन धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके मुख्य सिद्धांत, अहिंसा एवं विश्व की सभी वस्तुओं को शाश्वत मानना है। इस प्रकार, उन्होंने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए उपवास और विभिन्न पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया।
गांधीजी विद्यार्थी के रूप में - मोहनदास एक औसत विद्यार्थी थे,हालांकि उन्होंने यदा-कदा पुरस्कार और छात्रवृत्तियां भी जीतीं। वह पढ़ाई व खेल,दोनों में ही तेज नहीं थे। बीमार पिता की सेवा करना,घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाना और समय मिलने पर दूर तक अकेले सैर पर निकलना, उन्हें पसंद था। उन्हीं के शब्दों में उन्होंने 'बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा, उनमें मीनमेख निकालना नहीं।'
उनकी किशोरावस्था उनकी आयु-वर्ग के अधिकांश बच्चों से अधिक हलचल भरी नहीं थी। हर ऐसी नादानी के बाद वह स्वयं वादा करते 'फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा' और अपने वादे पर अटल रहते। उन्होंने सच्चाई और बलिदान के प्रतीक प्रह्लाद और हरिश्चंद्र जैसे पौराणिक हिन्दू नायकों को सजीव आदर्श के रूप में अपनाया।
गांधी जी जब केवल तेरह वर्ष के थे और स्कूल में पढ़ते थे उसी वक्त पोरबंदर के एक व्यापारी की पुत्री कस्तूरबा से उनका विवाह कर दिया गया।
युवा गांधी जी - 1887 में मोहनदास ने जैसे-तैसे 'बंबई यूनिवर्सिटी' की मैट्रिक की परीक्षा पास की और भावनगर स्थित 'सामलदास कॉलेज' में दाखिल लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेजी भाषा में जाने से उन्हें व्याख्यानों को समझने में कुछ दिक्कत होने लगी। इस बीच उनके परिवार में उनके भविष्य को लेकर चर्चा चल रही थी।
अगर निर्णय उन पर छोड़ा जाता, तो वह डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन वैष्णव परिवार में चीरफाड़ की इजाजत नहीं थी। साथ ही यह भी स्पष्ट था कि यदि उन्हें गुजरात के किसी राजघराने में उच्च पद प्राप्त करने की पारिवारिक परंंपरा निभानी है तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा और ऐसे में गांधीजी को इंग्लैंड जाना पड़ा।
यूं भी गांधी जी का मन उनके 'सामलदास कॉलेज' में कुछ खास नहीं लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सहज ही स्वीकार कर लिया। उनके युवा मन में इंग्लैंड की छवि 'दार्शनिकों और कवियों की भूमि, संंपूर्ण सभ्यता के केन्द्र' के रूप में थी। सितंबर 1888 में वह लंदन पहुंच गए। वहां पहुंचने के 10 दिन बाद वह लंदन के चार कानून महाविद्यालय में से एक 'इनर टेंपल'में दाखिल हो गए।
1906 में टांसवाल सरकार ने दक्षिण अफीका की भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए विशेष रूप से अपमानजनक अध्यादेश जारी किया। भारतीयों ने सितंबर 1906 में जोहेन्सबर्ग में गांधी के नेतृत्व में एक विरोध जनसभा का आयोजन किया और इस अध्यादेश के उल्लंघन तथा इसके परिणामस्वरूप दंड भुगतने की शपथ ली। इस प्रकार सत्याग्रह का जन्म हुआ, जो वेदना पहुंचाने के बजाए उन्हें झेलने, विद्वेषहीन प्रतिरोध करने और बिना हिंसा किए उससे लड़ने की नई तकनीक थी।
इसके बाद दक्षिण अफीका में सात वर्ष से अधिक समय तक संघर्ष चला। इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन गांधी के नेतृत्व में भारतीय अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय ने अपने शक्तिशाली प्रतिपक्षियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। सैकड़ों भारतीयों ने अपने स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाले इस कानून के सामने झुकने के बजाय अपनी आजीविका तथा स्वतंत्रता की बलि चढ़ाना ज्यादा पसंद किया।
फरवरी 1919 में अंग्रेजों के बनाए रॉलेट एक्ट कानून पर,जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए जेल भेजने का प्रावधान था, उन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। फिर गांधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आया, जिसने 1919 के बसंत में समूचे उपमहाद्वीप को झकझोर दिया।
इस सफलता से प्रेरणा लेकर महात्‍मा गांधी ने भारतीय स्‍वतंत्रता के लिए किए जाने वाले अन्‍य अभियानों में सत्‍याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखे, जैसे कि 'असहयोग आंदोलन', 'नागरिक अवज्ञा आंदोलन', 'दांडी यात्रा' तथा 'भारत छोड़ो आंदोलन'। गांधी जी के इन सारे प्रयासों से भारत को 15 अगस्‍त 1947 को स्‍वतंत्रता मिल गई।
उपसंहार - मोहनदास करमचंद गांधी भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनीतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। राजनीतिक और सामाजिक प्रगति की प्राप्ति हेतु अपने अहिंसक विरोध के सिद्धांत के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। विश्व पटल पर महात्मा गांधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक हैं।
महात्मा गांधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की के बारे में लोग जानते थे, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गांधी जयंती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है।
गांधी जी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -'हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर कभी आया था। 

Hindi essay on Ramkrishna Paramhans, Chatrapati Shivaji & Rani Laxmibai

रामकृष्ण परमहंस

पश्चिम बंगाल में हुगली तालुके में कामार नाम के गांव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था । इसी ब्राह्मण परिवार में 18 फरवरी, 1836 को एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया ।

तब कौन कह सकता था कि उस साधारण ब्राह्यण परिवार में जन्मा वह बालक एक दिन संसार भर में अध्यात्म गुरु के रूप में जाना जाएगा ।  बालक का नाम गदाधर रखा गया । पांच वर्ष की अल्पायु में ही बालक गदाधर की प्रखर बुद्धि और स्मृति ने सबको अचम्भित कर दिया ।

गदाधर अपने पूर्वजों की नामावली को धाराप्रवाह बखान करते तो सब लोग दांतों तले उंगली दबा लेते । रामायण गीता और महाभारत जैसे ग्रंथ भी गदाधर को कंठस्थ थे । उनकी विद्वत्ता देखकर उन्हें कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) शहर में यज्ञ हवनादि कार्य करने के लिए कहा गया ।

उस समय कलकत्ता में रानी रासमणि नाम की एक उदार भगवद्‌भक्त धनी स्त्री रहती थी । कई मंदिर और धर्मस्थानों का निर्माण कर चुकी रानी रासमणि ने दक्षिणेश्वर में काली मां का एक भव्य और विशाल मंदिर बनवाया । यही मंदिर गदाधर जी की साधना-स्थली बना ।

इसी मंदिर में आध्यात्मिक साधना का अवसर मिला तो युवा गदाधर ने अनन्य भाव से माता जगदम्बा की आराधना की । वह स्वयं माता को अपने हाथों से भले लगाते ।  उनके हृदय में कोई इच्छा तो थी ही नहीं । अन्य पुजारियों की भांति वह मां के सुमिरन में धन, ऐश्वर्य या भौतिक साधनों की इच्छा नहीं करते थे ।

उनकी तो सिर्फ एक ही इच्छा थी कि माता भगवती उन्हें साक्षात रूप में दर्शन दें । वह बहुत देर तक माता के सामने बैठकर मां से विनती करते कि : “हे आनंदमयी जगद्‌जननी जगरूपा मुझ अज्ञानी को दर्शन देकर कृतार्थ करो । दर्शन बिना जीवन अधूरा है । मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है मां ।”

इनके अंतर में दर्शन की अभिलाषा इतनी बढ़ गई कि यह व्याकुल हो उठे । इनका मन कहीं भी नहीं लगता था । एक दिन दर्शन विरह इतनी प्रबल हो गई कि इन्होंने अपना जीवन समाप्त करने का निश्चय किया । जब माता के दर्शन ही न हों तो ऐसे जीवन का क्या लाभ ! यही सोचकर इन्होंने अपना श्वास रोक लिया ।

तभी मंदिर का कण-कण दिव्य प्रकाश से नहा उठा । माता जगदम्बा अपने मनभावन तेजमय स्वरूप में साक्षात इनके सम्मुख थीं । गदाधर माता के चरणों में नतमस्तक हो गए । उसके बाद माता ने इन्हें कई बार दर्शन दिया । माता की कृपा से इन्हें तत्त्वज्ञान हो गया ।

तत्पश्चात इन्होंने संन्यासी तोतापुरीजी से संन्यास की दीक्षा ली और उन्होंने ही इन्हें ‘रामकृष्ण परमहंस’ का नाम दिया । माता की कृपा से परमहंस का मन अन्य सभी कार्यों से विरक्त हो गया । अब भगवान के भिन्न स्वरूपों के दर्शन पाने की इच्छा से इन्होंने भगवान राम की उपासना की ।

इन्हें श्रीराम और माता सीता के साक्षात दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ । सन् 1862 ई. में श्री परमहंस ने एक महायोगिनी तपस्विनी के मार्गदर्शन में तंत्र-मंत्र की कठिन साधना की । परमहंस प्रेम-पंथ की चरमसीमा पर पहुंच गए थे । अब वे ब्रह्म के अद्वैत साक्षात्कार के अधिकारी बन गए थे ।

जब इनकी भक्ति शिखर पर पहुच गई तौ मा जगदम्बा ने ब्रह्मज्ञान के महारहस्य की दीक्षा देने हेतु वेदांत के प्रकाड विद्वान को भेजा । उनकी कृपा से यह भगवान के सर्वरूपों में समाहित हो गए और छह माह की कठिन साधना-समाधि में लीन हो गए ।

इस समाधि के बाद परमहंस को माता जगदम्बिका का साध्य प्राप्त हो गया । अब माता स्वयं साकार होकर उनके हाथों से भोग ग्रहण करतीं और वे एक बालक की भांति मां को भोग लगाकर प्रसन्न होते । इनके पास कितने ही साधकों ने साधना-सिद्धि की ।

इनके शिष्यों में नरेन्द्रनाथ सर्वगुणसम्पन्न और सच्चे साधक थे । उनकी दृढ़ता और जिज्ञासा अपार थी । परमहंस ने नरेन्द्रनाथ को ही अपने उद्‌देश्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया । यही नरेन्द्रनाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्वविख्यात हुए ।

रामकृष्ण परमहंस ने मां दुर्गा में ही भगवान के दर्शन कर लिए थे । उनका मूर्ति में ही सजीव भाव था । बताते हैं कि एक बार मां की मूर्ति खंडित हो गई थी तो वे बहुत रोए थे और उन्होंने मूर्ति की खंडित टांगों को स्वयं चिपकाया था आज भी वह मूर्ति दक्षिणेश्वर में विराजमान है ।

अत में इन्हें गले का कैंसर हो गया और एक वर्ष पश्चात 15 अगस्त, 1886 को इन्होंने महासमाधि ले ली और ब्रह्मलीन हो गए । परमहंसजी अध्यात्म के तत्त्वद्रष्टा युगद्रष्टा थे । वह भारत की प्राचीन संस्कृति पर अटूट श्रद्धा रखते थे । हिन्दू धर्म और आर्य संस्कृति के महान आदर्शों को प्रकट करते हुए उस छोटे से बालक गदाधर ने रामकृष्ण परमहंस के रूप में अपना जीवन सार्थक कर दिखाया ।

क्षत्रपति शिवाजी

क्षत्रपति शिवाजी इतिहास पुरुष हैं । भारत के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है । वो महावीर होने के साथ-साथ महान गुरु भक्त भी थे ।

यह सच हें कि यदि किसी के व्यक्तित्व में शुद्ध सोने-सा निखार आता है तो उसके पीछे किसी पारसमणि का हाथ अवश्य है शिवाजी के जीवन में वो पारसमणि थे समर्थ गुरु रामदास । विरक्तों-सा जीवन-जीने वाले बाबा रामदास देखने में जितने साधारण थे उनकी अंतरआत्मा में परमज्ञान की उतनी विलक्षण ज्योति प्रज्वलित थी ।

उन्होंने ‘दासबोध’ जैसे महान ग्रंथ की रचना करके अपने विलक्षण ज्ञान का परिचय दिया । जब गुरु रामदास की शिवाजी से भेंट हुई तो उन्हें उस मानवप्रतिमा में सोई पड़ी प्रबल ऊर्जा का आभास हुआ उन्होने शिवा को आपने शिष्य स्वीकार किया । इस प्रकार एक समर्थ गुरु की देखरेख में उनकी शिक्षा आरंभ हुई ।

बालक शिवा पूर्ण लगन के साथ द्वारा दिए जाने वाले ज्ञान का अमृत पान करने लगा । दासबोध ग्रंथ में वर्णित दिव्य दिव्य ज्ञान का प्रसाद भी शिवाजी को मिला । गुरु ने अपनी दूरदृष्टि से जान लिया था कि शिवा को शास्त्र ज्ञान के अलवा शस्त्र ज्ञान की भी आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए शिवाजी को शस्त्र संचालन का ज्ञान भी दिया जाने लगा ।

अपनी एकाग्रता और गुरु पर पूर्ण श्रद्धा रखने के कारण शिवाजी ने शीघ्र ही शास्त्रों और शस्त्रो का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया लेकिन फिर भी शिवा की जिज्ञासा शांत न होती थी और शिवाजी की उसी जिज्ञासा के कारण गुरु भी अपना सम्पूर्ण ज्ञान अपने शिष्य में अड़ेल देना चाहते थे ।

गुरु रामदास को अपने योग्य शिष्य शिवा जी की निष्ठा पर कोई संदेह तो नहीं था फिर भी वो शिवा की एक परीक्षा लेना चाहते थे । एक सुबह उन्होने अपने सभी शिष्यों को पुकारा और कहा कि अब कुछ दिन वो उन्हें शिक्षा न दे सकेंगे क्योंकि उनके पांव में एक भयंकर फोड़ा उग आया है ।

जो पकने के कारण भीषण पीड़ा दे रहा है । गुरु रामदास के पांव में पट्‌टी बंधी थी । पांव फूला-फूला और भयंकर-सा दिखाई दे रहा था । कुछ शिष्य तो इतने डर गए कि रोने लगे कुछ ने मुंह फेर लिया और कुछ ने साहस करके गुरु से पूछा : ”आप तो सामर्थवान हैं गुरुदेव इस फोड़े से छुटकारा पाने का कोड तो उपाय अवश्य जानते होंगे ।”

गुरु ने एक आह भरी और कहा : ”नहीं वत्स इसका कोई उपाय मैं जानता होता तो अवश्य ही इससे छटकारा पा चुका होता । लगता है ये मेरे द्वारा पूर्व जन्म में किए गए किसी अपराध का फल है ।” ”गुरुदेव! क्या हम आपकी कोई सहायता कर सकते हैं ।” शिवा ने उत्सुकता से  पूछा : ”हां-हां गुरुदेव हमें भी बताइए हम आपका कष्ट दूर करने का पूर्ण प्रयत्न करेंगे ।” अन्य शिष्य भी आगे बढ़कर बोले ।

गुरु रामदास बोले : ”हाँ वत्स एक उपाय तो है परंतु वह बहुत मुश्किल है । उसे मैं बताना तो नहीं चाहता था परतु तुम सब जब इतना पूछ रहे हो तो बताता हूं । यदि इस फोड़े का मवाद कोई अपने मुख से खींच कर निकाल दे तो मुझे निश्चित ही आराम मिल सकता है ।”

गुरु ने शिष्यों के आग्रह पर पीड़ा से छुटकारा पाने का उपाय बताया । अब उनकी नजर सहायता के लिए अपने शिष्यों पर थी । सभी शिष्य एक दूसरे का मुख ताक रहे थे किसी से कोई उत्तर देते न बन रहा था । गुरु ने पुन : पूछा : ”क्या तुममें से कोई मुझे पीड़ा से मुक्ति दिला सकता है या फिर मैं विश्राम के लिए चला जाऊँ ।”

”मैं दिलाऊंगा आपको पीड़ा से मुक्ति । मैं अपने मुख से खींच कर निकालूंगा आपको पीड़ा देने वाला ये मवाद ।” शिवा ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर कहा ।  गुरु रामदास को शिवा से ऐसी ही आशा थी उन्होंने तुरंत अपना पाव आगे किया और फोड़े से थोड़ी-सी पट्‌टी हटाकर शिवा से कहा : ”लो वत्स अब देर न करो मुझे असहनीय पीड़ा हो रही है ।”

शिवा ने आंख मुंदकर ईश्वर से प्रार्थना की और गुरु के चरण स्पर्श करके उस घाव में अपना मुख लगा दिया । ये क्या उस फोड़े पर मुख लगाते ही शिवा हैरान रह गया वो मवाद नहीं आम का रस था । उसके गुरु ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए एक पके आम को अपने पैर पर बाध लिया था ।

शिवा ने आश्चर्य भरी दृष्टि से जब गुरु की ओर देखा तो उनकी आखों से प्रेमाश्रु छलक रहे थे उन्होंने शिवा को अपने हृदय से लगा लिया और कहा : ”वत्स तूने मेरी दी हुई शिक्षा को सार्थक कर दिया, मैं तुझे अशीर्वाद देता हूं कि इस नश्वर संसार में तेरी कीर्ति अमर हो जाएगी, तेरा नाम इतिहास में स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जाएगा ।”

गुरु का आशीर्वाद शिवाजी के जीवन में फलीभूत हुआ उनमें निर्भीकता अन्याय से मुकाबला करने की क्षमता और संगठनात्मक योगदान का विकास गुरु की कृपा से ही आया । शिवाजी ने अन्याय के विरुद्ध लड़ने का फैसला किया उनके नेतृत्व में जो लड़ता वो साक्षात शिव का रूप नजर आता था । उनके सधे हुए आक्रमणों से शत्रु थर्रा उठता था ।

शिवाजी के युद्ध का उद्देश्य रक्तपात नहीं अन्याय का अत करके शांति स्थापित करना था जिसमें उन्हें इच्छित सफलता प्राप्त हुई और वो शिवा से छत्रपति शिवाजी बन गए । अब शिवाजी सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य के एक मात्र अधिपति थे ।

शिवाजी की विजय यात्रा की सूचना यदा-कदा उनके गुरु के कानों तक पहुंचती रहती थी । एक बार उनके गुरु भिक्षा लेने उनके साम्राज्य में पहुंचे और भिक्षा के लिए आवाज लगाई । चिरपरिचित आवाज सुनकर शिवाजी आदोलित हो गए वो सब काम छोड्‌कर द्वार पर पहुंचे और गुरु के चरणों में गिर पड़े । गुरु रामदास ने उन्हें उठाया और कहा:

”शिवा! अब तू मेरा शिष्य नहीं एक सम्राट है मैं तो भिक्षा की आशा लेकर यहा आया था क्या मुझे कुछ भिक्षा मिलेगी ।”  गुरु का आग्रह सुनकर एक पल को तो शिवाजी स्तब्ध रह गए । उन्हें लगा कि उनके गुरु ने उनकी किसी अंजानी भूल के कारण उनका त्याग तो नहीं कर दिया ।

”किस सोच में पड़ गए राजन”: गुरु रामदास ने पुन: कहा: ” क्या मुझे कुछ भिक्षा मिलेगी ।” गुरु की वाणी ने शिवाजी की तंद्रा भंग की । ”हां गुरुदेव मैं अभी आया”: शिवाजी तुरंत अपने कक्ष में गए और एक कागज का टुकड़ा लेकर लौटे और गुरु के भिक्षापात्र में डाल कर बोले: ”मैं आपको क्या दे सकता हूं ये सब कुछ तो आप ही का दिया हुआ है ।”

शिवाजी ने गुरु को प्राणाम किया, गुरु उन्हें आशीर्वाद देकर आगे बढ़ गए । कुटिया में आकर रामदास ने उस पर्चे को पड़ा । उसमें लिखा था : ‘सारा राज्य आपको समर्पित है’ और उसके नीचे राजमूहर भी अंकित थी । समर्थ गुरु रामदास ने अपने शिष्य की देन की सराहना की और ईश्वर का धान्यवाद किया कि उनकी शिक्षा में कोई त्रुटि नहीं रही ।

शिवाजी ने केवल अपने गुरु को एक पत्र में चन्द लाइनें ही नहीं लिखी थीं उन्होंने उसी दिन से अपने गुरु की खड़ाऊ को सिंहासन पर आसीन कर दिया और गुरु के भगवाध्वज को अपने राज्य का राज्य-चिन्ह बना दिया । उस काल की मुद्रा पर भी शिवाजी के गुरु समर्थगुरु रामदास का चित्र देखा जा सकता है ।

एक बार शिवाजी को औरंगजेब ने उनके पुत्र के साथ बंदी बना लिया । कुछ महीने वे औरंगजेब की कैद में रहने के बाद भाग निकले । बाद में जब उनके साथियों ने उनसे पूछा कि : ”महाराज आप औरंगजेब जैसे क्रूर राजा के कैद से कैसे निकल पाए” तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा : ”कैद में बराबर मुझे समर्थगुरु रामदास की छाया नजर आती थी ।

जब मैंने भागने की तैयारी कर ली तो लगा कि गुरुवर मेरे सामने खड़े हैं और कह रहे हैं : शिवा तू डर मत निकल जा । जब मैं वहा से मिठाई के टोकरे में छिपकर निकलने लगा तो मुझे लगा कि गुरुदेव मेरे साथ हैं । सारे-पहरेदारों की आखों पर जैसे पर्दा-सा पड़ गया और मैं बाहर निकल गया ।”

ये एक समर्थ गुरु के समर्थ शिष्य की कहानी है जो सदियों तक एक वैरागी गुरु और एक त्यागी शिष्य की याद दिलाती रहेगी । सच तो यह है कि जिसे गुरु कृपा प्राप्त हो जाती है उसके लिए ससार के सारे साधन सुलभ हो जाते हैं । आग का तपता दरिया भी उसके लिए शीतल हो जाता है ।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

प्रस्तावना : भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं। सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नहीं घबराता है। प्रलोभन उसे कर्तव्य पालन से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार और उच्च होता है। उसका चरित्र अनुकरणीय होता है। अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं वीरांगना लक्ष्मीबाई।

परिचय : महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनुबाई के नाम से जानी जाती थीं।

विवाह : इधर सन्‌ 1838 में गंगाधर राव को झांसी का राजा घोषित किया गया। वे विधुर थे। सन्‌ 1850 में मनुबाई से उनका विवाह हुआ। सन्‌ 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। झांसी के कोने-कोने में आनंद की लहर प्रवाहित हुई, लेकिन चार माह पश्चात उस बालक का निधन हो गया।

सारी झांसी शोक सागर में निमग्न हो गई। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे।
यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंगरेजी सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

संघर्ष : 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तकपुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंगरेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। पोलेटिकल एजेंट की सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार हुआ। झांसी की रानी ने पेंशन अस्वीकृत कर दी व नगर के राजमहल में निवास करने लगीं।

यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। अंगरेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने इसको स्वर्णावसर माना और क्रांति की ज्वालाओं को अधिक सुलगाया तथा अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई।

नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे।

विद्रोह : भारत की जनता में विद्रोह की ज्वाला भभक गई। समस्त देश में सुसंगठित और सुदृढ रूप से क्रांति को कार्यान्वित करने की तिथि 31 मई 1857 निश्चित की गई, लेकिन इससे पूर्व ही क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित हो गई और 7 मई 1857 को मेरठ में तथा 4 जून 1857 को कानपुर में, भीषण विप्लव हो गए। कानपुर तो 28 जून 1857 को पूर्ण स्वतंत्र हो गया। अंगरेजों के कमांडर सर ह्यूरोज ने अपनी सेना को सुसंगठित कर विद्रोह दबाने का प्रयत्न किया।

उन्होंने सागर, गढ़कोटा, शाहगढ़, मदनपुर, मडखेड़ा, वानपुर और तालबेहट पर अधिकार कियाऔर नृशंसतापूर्ण अत्याचार किए। फिर झांसी की ओर अपना कदम बढ़ाया और अपना मोर्चा कैमासन पहाड़ी के मैदान में पूर्व और दक्षिण के मध्य लगा लिया।

लक्ष्मीबाई पहले से ही सतर्क थीं और वानपुर के राजा मर्दनसिंह से भी इस युद्ध की सूचना तथा उनके आगमन की सूचना प्राप्त हो चुकी थी। 23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ। कुशल तोपची गुलाम गौस खां ने झांसी की रानी के आदेशानुसार तोपों के लक्ष्य साधकर ऐसे गोले फेंके कि पहली बार में ही अंगरेजी सेना के छक्के छूट गए।

रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंगरेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। रानी ने खुलेरूप से शत्रु का सामना किया और युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया।

वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंगरेजों से युद्ध करती रहीं। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं।

उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंगरेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। रानी का घोड़ा बुरी तरह घायल हो गया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन रानी ने साहस नहीं छोड़ा और शौर्य का प्रदर्शन किया।

कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय का नहीं था, अपनी शक्ति को सुसंगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था।

उपसंहार : सेनापति सर ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता रहा और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने ग्वालियर का किला घमासान युद्ध करके अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंततः उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की अंतिम आहूति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और स्वतंत्रता के लिए बलिदान का संदेश दिया।

शब्द शक्तियाँ in hindi

 शब्द शक्तियां

शब्द शक्तियां
शब्द की शक्ति असीम है। शब्द हमारे मन, कल्पना तथा अनुभूति पर प्रभाव डालता है। प्रयोग के अनुसार शब्द का अर्थ बदल जाता है। अभीष्ट अर्थ श्रोता तक पहुंचाने की क्षमता अथवा शब्द में छिपे हुए तात्पर्य को प्रसंगानुसार स्पष्ट करने की सामर्थ्य शब्द शक्ति है

उदाहरण के लिए :-

रमेश की 'गाय' 5 किलो दूध देती है तथा:- सुमित्रा की बहु तो निरी 'गाय' है। इन दोनों वाक्यों में 'गाय' शब्द आया है मगर अर्थ दोनों में भिन्न (एक में पशु का नाम तो दूसरे में भोला-भाला सीधा व सरल व्यक्ति) है। इस प्रकार वक्ता या लेखक के अभिष्ट का बोध कराने का गुण ही शब्द शक्ति है।

शब्द और अर्थ के इस चमत्कारिक स्वरूप को प्रकट करने वाले शब्द शक्तियां तीन प्रकार की है:-

1. अभिधा शब्द शक्ति:-
शब्द कि जिस शक्ति से किसी शब्द के सबसे साधारण, लोक प्रचलित अथवा मुख्य अर्थ का बोध होता है, उसे "अभिधा शब्द शक्ति" कहते हैं।
शब्द को सुनते ही अथवा पढ़ते ही श्रोता या पाठक उसके सबसे सरल, प्रचलित अर्थ को बिना अवरोध के ग्रहण करता है, वह ,अभिधा शब्द शक्ति, कहलाती है।
अभिधा शब्द शक्ति के उदाहरण:-
(1) राजा दशरथ अयोध्या के राजा थे।
(2) गुलाब का फूल बहुत सुंदर है।
(3) मोहन पुस्तक पढ़ रहा है।
(4) गाय घास चर रही है।
उपर्युक्त सभी वाक्यों के अर्थ ग्रहण में किसी प्रकार का अवरोध नहीं है।

2. लक्षणा शब्द शक्ति:-
जब किसी शब्द के मुख्यार्थ में बाधा हो या अभीष्ट अर्थ का बोध न हो तब अन्य अर्थ किसी लक्षण पर अथवा दीर्घकाल से माने जा रहे रूढ़ अर्थ पर आधारित होता है।
लक्षणा शब्द शक्ति के दो भेद इस प्रकार है =
(i) पुलिस देख चोर चौकन्ना हो गया
इसमें चोर द्वारा 'चौकन्ना' होने का अर्थ है- सजग हो जाना, सावधान हो जाना या अपने बचाव का उपाय सोच लेना। जबकि चौकन्ना का शाब्दिक अर्थ है चौ = चार, कन्ना = कान अर्थात 'चार कान वाला' अतः दो की जगह चार कान कहने का तात्पर्य है कानो का अधिकाधिक उपयोग करना, उनका पूरा लाभ उठाना। अतः यह अर्थ लक्षण पर आधारित हुआ। अतः यह 'प्रयोजनवती लक्षणा' कहलाता है।
इसी प्रकार उदाहरण :-
(ii) राजेश का पुत्र ऊँट हो गया।
इसमें 'ऊँट' का अर्थ है- अधिक लंबा होना। अब यह अर्थ 'रूढ़ि' के आधार पर लिया गया है। अतः यह 'रूढा लक्षणा' कहलाता है। इस प्रकार लक्षणा शब्द शक्ति में लक्षण या प्रयोजन तथा रूढ़ि द्वारा अर्थ ग्रहण किया जाता है।
अन्य उदाहरण:-
(1) लाला लाजपत राय पंजाब के शेर हैं।
(2) सारा घर मेला देखने गया।
(3) नरेश तो गधा है।
(4) वह हवा से बातें कर रहा था।
(5) सैनिकों ने कमर कस ली।
उदाहरणों में 'शेर', 'घर', 'गधा', 'हवा', 'कमर कसना' आदि लाक्षणिक अर्थ है जिनके लाक्षणिक अर्थ ही ग्रहण किए जाएंगे।

3. व्यंजना शब्द शक्ति:-
जब किसी शब्द का अर्थ में अभिधा से प्रकट होता है ना लक्षणा से बल्कि कोई अन्य अर्थ ही प्रकट होता है। वह "व्यंजना शब्द शक्ति" होती है।
'व्यंजना' का अर्थ है विकसित करना, स्पष्ट करना, रहस्य खोलना। अतः किसी शब्द का छुपा हुआ अन्य अर्थ ज्ञात करना ही व्यंजना शब्द शक्ति कहलाती है। इस में कथन के संदर्भ में के अनुसार एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ प्रकट होते हैं तो कभी श्रोता या पाठक की कल्पना शक्ति कोई नया अर्थ कर लेती है।
जैसे:- "संध्या हो गई" वाक्य का अर्थ "चरवाहे के लिए घर लौटने का समय" तो 'पुजारी के लिए पूजन वंदन का समय' है।
'व्यंजना' शब्द शक्ति से प्राप्त अर्थ को दो भागों में विभक्त करते हैं:-
(i) शाब्दी व्यंजना
(ii) आर्थी व्यंजना

(i) शाब्दी व्यंजना:-
जब व्यंजना शब्द पर निर्भर हो, शब्द बदल देने से अर्थात पर्याय रख देने से अर्थ बदल जाता हो वहां व्यंजना होती है क्योंकि अभिष्ट अर्थ के लिए वही शब्द आवश्यक है।
जैसे:-
चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर। को घटि, ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर।।
यहां वृषभानुजा का अर्थ राधा तथा गाय हैं वही हलधर के भी दो अर्थ बलराम तथा बैल है। अतः यहां शब्द का चमत्कार जो पर्याय रख देने पर नहीं रह सकता।
शाब्दी व्यंजना का अन्य उदाहरण:-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।
इसमें पानी शब्द के तीन अर्थ (चमक, सम्मान एवं जल) उसके पर्याय रख देने पर नहीं रहेंगे।

(ii)आर्थी व्यंजना:-
जब शब्दार्थ की व्यंजना अर्थ पर निर्भर रहती है। उसका पर्याय रख देने पर भी अभीष्ट की पूर्ति हो जाती है वहां आर्थी व्यंजना होती है। आर्थी व्यंजना में बोलने वाले, सुनने वाले, प्रकरण, देशकाल, कंठ-स्वर आदि का बोध कराती है।
जैसे-
सघन कुंज, छाया सुखद, सीतल मंद समीर।
मन ह्वै जात अजौं वहै, वा यमुना के तीर।।
इसमें गोपिका कृष्ण के साथ बिताए यमुना तट की लीलाओं को याद कर रही है। जो बातें वह कहना चाहती है, ह्रदय के जिन भावों का प्रभाव वह व्यक्त करना चाहती है वह समस्त भाव संसार यहां व्यक्त हो गया है।

समास in hindi

समास

समास

समास का तात्पर्य है ‘संक्षिप्तीकरण’। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन एवं सार्थक शब्द को समास कहते हैं। जैसे - ‘रसोई के लिए घर’ इसे हम ‘रसोईघर’ भी कह सकते हैं। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में समास का बहुतायत में प्रयोग होता है। जर्मन आदि भाषाओं में भी समास का बहुत अधिक प्रयोग होता है।

परिभाषाएँ

सामासिक शब्द
समास के नियमों से निर्मित शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। इसे समस्तपद भी कहते हैं। समास होने के बाद विभक्तियों के चिह्न (परसर्ग) लुप्त हो जाते हैं। जैसे-राजपुत्र।

समास-विग्रह
सामासिक शब्दों के बीच के संबंध को स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है। जैसे-राजपुत्र-राजा का पुत्र।

पूर्वपद और उत्तरपद
समास में दो पद (शब्द) होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। जैसे-गंगाजल। इसमें गंगा पूर्वपद और जल उत्तरपद है।

संस्कृत में समासों का बहुत प्रयोग होता है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी समास उपयोग होता है। समास के बारे में संस्कृत में एक सूक्ति प्रसिद्ध है:

वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः।
तत् पुरुष कर्म धारय येनाहं स्यां बहुव्रीहिः॥
समास के भेद
समास के छः भेद होते हैं:

अव्ययीभाव
तत्पुरुष
द्विगु
द्वन्द्व
बहुव्रीहि
कर्मधारय
अव्ययीभाव समास
जिस समास का पहला पद(पूर्व पद) प्रधान हो और वह अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे - यथामति (मति के अनुसार), आमरण (मृत्यु कर) न् इनमें यथा और आ अव्यय हैं।

कुछ अन्य उदाहरण -

आजीवन - जीवन-भर
यथासामर्थ्य - सामर्थ्य के अनुसार
यथाशक्ति - शक्ति के अनुसार
यथाविधि- विधि के अनुसार
यथाक्रम - क्रम के अनुसार
भरपेट- पेट भरकर
हररोज़ - रोज़-रोज़
हाथोंहाथ - हाथ ही हाथ में
रातोंरात - रात ही रात में
प्रतिदिन - प्रत्येक दिन
बेशक - शक के बिना
निडर - डर के बिना
निस्संदेह - संदेह के बिना
प्रतिवर्ष - हर वर्ष
अव्ययीभाव समास की पहचान - इसमें समस्त पद अव्यय बन जाता है अर्थात समास लगाने के बाद उसका रूप कभी नहीं बदलता है। इसके साथ विभक्ति चिह्न भी नहीं लगता। जैसे - ऊपर के समस्त शब्द है।

तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास - जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद गौण हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे - तुलसीदासकृत = तुलसी द्वारा कृत (रचित)

ज्ञातव्य- विग्रह में जो कारक प्रकट हो उसी कारक वाला वह समास होता है।

विभक्तियों के नाम के अनुसार तत्पुरुष समास के छह भेद हैं-

कर्म तत्पुरुष (गिरहकट - गिरह को काटने वाला)
करण तत्पुरुष (मनचाहा - मन से चाहा)
संप्रदान तत्पुरुष (रसोईघर - रसोई के लिए घर)
अपादान तत्पुरुष (देशनिकाला - देश से निकाला)
संबंध तत्पुरुष (गंगाजल - गंगा का जल)
अधिकरण तत्पुरुष (नगरवास - नगर में वास)
तत्पुरुष समास के प्रकार
नञ तत्पुरुष समास
जिस समास में पहला पद निषेधात्मक हो उसे नञ तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे -
समस्त पद समास-विग्रह समस्त पद समास-विग्रह
असभ्य न सभ्य अनंत न अंत
अनादि न आदि असंभव न संभव

कर्मधारय समास
जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्वपद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है। जैसे -

समस्त पद समास-विग्रह समस्त पद समास-विग्रह
चंद्रमुख चंद्र जैसा मुख कमलनयन कमल के समान नयन
देहलता देह रूपी लता दहीबड़ा दही में डूबा बड़ा
नीलकमल नीला कमल पीतांबर पीला अंबर (वस्त्र)
सज्जन सत् (अच्छा) जन नरसिंह नरों में सिंह के समान
द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो उसे द्विगु समास कहते हैं। इससे समूह अथवा समाहार का बोध होता है। जैसे -

समस्त पद समास-विग्रह समस्त पद समास-विग्रह
नवग्रह नौ ग्रहों का समूह दोपहर दो पहरों का समाहार
त्रिलोक तीन लोकों का समाहार चौमासा चार मासों का समूह
नवरात्र नौ रात्रियों का समूह शताब्दी सौ अब्दो (वर्षों) का समूह
अठन्नी आठ आनों का समूह त्रयम्बकेश्वर तीन लोकों का ईश्वर

द्वन्द्व समास
जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर ‘और’, अथवा, ‘या’, एवं लगता है, वह द्वंद्व समास कहलाता है। जैसे-
समस्त पद समास-विग्रह समस्त पद समास-विग्रह
पाप-पुण्य पाप और पुण्य अन्न-जल अन्न और जल
सीता-राम सीता और राम खरा-खोटा खरा और खोटा
ऊँच-नीच ऊँच और नीच राधा-कृष्ण राधा और कृष्ण

बहुव्रीहि समास
जिस समास के दोनों पद अप्रधान हों और समस्तपद के अर्थ के अतिरिक्त कोई सांकेतिक अर्थ प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। जैसे -

समस्त पद समास-विग्रह
दशानन दश है आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण
नीलकंठ नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव
सुलोचना सुंदर है लोचन जिसके अर्थात् मेघनाद की पत्नी
पीतांबर पीला है अम्बर (वस्त्र) जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण
लंबोदर लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् गणेशजी
दुरात्मा बुरी आत्मा वाला ( दुष्ट)
श्वेतांबर श्वेत है जिसके अंबर (वस्त्र) अर्थात् सरस्वती जी

कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर
कर्मधारय में समस्त-पद का एक पद दूसरे का विशेषण होता है। इसमें शब्दार्थ प्रधान होता है। जैसे - नीलकंठ = नीला कंठ। बहुव्रीहि में समस्त पद के दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य का संबंध नहीं होता अपितु वह समस्त पद ही किसी अन्य संज्ञादि का विशेषण होता है। इसके साथ ही शब्दार्थ गौण होता है और कोई भिन्नार्थ ही प्रधान हो जाता है। जैसे - नील+कंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात शिव।.

संधि और समास में अंतर
संधि वर्णों में होती है। इसमें विभक्ति या शब्द का लोप नहीं होता है।
जैसे - देव + आलय = देवालय।

समास दो पदों में होता है। समास होने पर विभक्ति या शब्दों का लोप भी हो जाता है।
जैसे - माता और पिता = माता-पिता। 

Business idea

टेलीमार्केटिंग

मार्केटिंग कंपनियों के लिए डायरेक्ट या टेलीमार्केटिंग का काम भी है। किसी कंपनी की फ्रैंचाइजी लेने का कार्य भी हो सकता है। 

कंप्यूटर की जानकारी है तो

यदि  आप कंप्यूटर के जानकार हैं और यदि घर पर कम्प्यूटर और इंटरनट कनेक्शन है तो आप बड़े प्रोसेसिंग, वेबपेज डिजाइनिंग, बड़ी कंपनियों का बैकरूम डाक्युमेंटेशन, डाटाबेस और ग्रॉफिक डिजाइनिंग का काम भी कर सकते हैं।
 इसके अतिरिक्त अनुवाद, विदेशी भाषाओं की टीचिंग, बोलचाल की इंग्लिश, लेटर तैयार करने तथा पब्लिशिंग कंपनियों के लिए एडीटिंग तथा प्रूफ रीडिंग का भी काम कर सकते हैं।
यदि कारपोरेट सेक्टर में आप के अच्छे संपर्क हैं तो आप घर बैठे प्लेसमेंट सर्विस भी सफलतापूर्वक कर सकते हैं।
यदि बड़े शहर में आपके पास बड़ा मकान है तो अतिरिक्त कमरे में बेड और ब्रेकफास्ट सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं।

ऑनलाइन टीचिंग

ऑनलाइन टीचिंग एक विकल्प है, कैटरिंग या बुटिक का बिजनेस भी है, महिलाएं बच्चों के देखभाल का काम भी कर सकती हैं, काउंसलिंग, सौंदर्य संबंधी सुझाव, कुकरी, डांस/म्युजिक क्लास, फिटनेस/ऐरोबिक्स, इंश्योरेंस या म्यूचुअल फंड, फाइनेंशियल प्लानिंग, नेटवर्क मार्केटिंग (एमवे, एवन, एवियांस, टयूपरवेआ, मोडिकेयर आदि कर सकती हैं।) 

फिटनेस इंस्ट्रुक्टर

यदि आप ट्रेनिंग क्लासेज शुरू करना चाहते हैं तो आपको बोनिक्स की अधिक जानकारी हासिल करनी होगी। आपको विशेष रूप से अध्ययन करना होगा या एडवांस्ड इंस्ट्रुक्टर लेवल कोर्स करना होगा। उदाहरण के तौर पर यदि आप रेकी की टीचिंग करना या प्रैक्टिस करना चाहते हैं तो लेवल एक ओर लेवल दो से लेवल तीन और चार तक जाना होगा। 

टीम बनाएं

कार्य के बोझ को हल्का करने के लिए आप किसी फ्रेंड को टीम में शामिल कर सकते हैं। आप प्रोडक्शन, प्लानिंग, एडमिनिस्ट्रेशन और सप्लाई का काम देखें और मित्र बाहर का जैसे लोगों से मिलना, आर्डर लेना, पेमेंट लाना आदि। आप अपने प्रोडक्ट या सर्विस की टेली मार्केटिंग भी कर सकते हैं जबकि मित्र सेल्स काल ऑर्डर कर सकते हैं।

किसी कारण से यदि आप पूरी दिन का समय न दे सकते हों तो किसी बीपीओ या केपीओ में 3-4 घंटे का शिफ्ट वर्क कर सकते हैं। जॉब के विज्ञापन का इंतजार करने की बजाय कंपनियों से सीधे संपर्क कीजिए। याद रखें, सभी जगह विज्ञापन नहीं दिया जाता। काम की तलाश के लिए उम्र, महिला या पुरुष, स्टेटस आदि का प्रतिबंध नहीं होता। आपको सिर्फ यह पता करना है कि आपके पास कितना समय है और इसमें से कितना कार्य कर सकते हैं। 

बिजनेस आइडिया को देने से पहले इन सवालों का जवाब तलाश लें

आप लोगों से सीधे जुड़ना चाहते हैं?
-आप फुल टाइम बिजनेस करना चाहते हैं या पार्ट टाइम?
-आपके पास क्या स्त्रोत उपलब्ध है ( पैसा, उपकरण, जगह व जानकारी के संबंध में)
-आप कितना रिस्क ले सकते हैं?
-आप पारंपरिक बिजनेस करना चाहते हैं या कोई अलग हटकर नया बिजनेस शुरू करना चाहते हैं।
-अपने परिवार सहित आप किसी और से सहयोग प्राप्त कर सकते हैं?
-आप जो बिजनेस करने जा रहे हैं, उसका बाजार कितना बड़ा है?
-आप जितनी आय चाहते हैं उसके क्या इतने खरीददार हैं जहां तक आप अपनी पहुंच बना सकें?
-आपको किसी विशेष लाइसेंस या ट्रेनिंग की जरूरत है? (जैसे इंश्योरेंस एजेंट्स, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन या वेब डिजाइनिंग के लिए आई आर डी ए सर्टिफिकेशन)











Hindi essay :समाचार पत्र

समाचार पत्र 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । उसके हृदय में कौतूहल और जिज्ञासा दो ऐसी वृत्तियां हैं जिनसे प्रेरित हो यह अपने आसपास समेत विश्व में कहां क्या घटित हो रहा है उन घटनाओं से परिचित होना चाहता

है । वर्तमान में ऐसा कोई भी देश नहीं है जहाँ कुछ न कुछ न हो रहा हो ।

यह राजनीतिक, सामाजिक या फिर आर्थिक किसी भी रूप में हो सकता है । विज्ञान के इस युग में नये-नये आविष्कार या अनुसंधान रोजना हो रहे हैं । इन सबको जानने का सबसे सस्ता साधन है समाचार पत्र । यह विश्व में घटित घटनाओं का दस्तावेज भी कहलाता है । आज से तीन शताब्दी पहले तक लोगों को समाचार पत्रों के बारे में ज्ञान नहीं था ।

संदेशवाहक ही समाचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे । समाचार पत्रों का जन्म इटली के वेनिसनगर में तेरहवीं शताब्दी में पहला समाचार पत्र अस्तित्व में आया । समाचार पत्र के शुरुआत को लेकर कोई मतैक्य नहीं है । कुछ लोगों का मानना है कि पहला समाचार पत्र 1609 में जर्मनी से प्रकाशित हुआ जबकि कुछ लोगों का मानना है कि पहला समाचार पत्र सातवीं शताब्दी में चीन से प्रकाशित हुआ ।

जर्मनी के बाद ब्रिटेन में 1662 में समाचार पत्र के प्रकाशन का पता चलता है । भारत में 1834 में इंडिया गजट के नाम से समाचार पत्र प्रकाशित हुआ । भारत में अंग्रेजों के आगमन से मुद्रण कला में हुई प्रगति के साथ-साथ भारत में भी समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ ।

भारत से प्रकाशित पहले समाचार पत्र का नाम ‘इंडिया गजट’  था । इसके बाद हिन्दी का पहला साप्ताहिक समाचार पत्र 30 मई, 1826 को प्रकाशित हुआ । ‘उदन्त मार्तन्ड’ के नाम से प्रकाशित यह समाचार पत्र साप्ताहिक था । इसके बाद राजा राममोहन राय ने ‘कौमुदी’ और ईश्वर चद्र ने ‘प्रभाकर’ नामक पत्र निकाले ।

इनके बाद तो एक-एक कर कई समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हो गया । आज करीब पचास हजार दैनिक, साप्ताहिक सहित समाचार पत्रों का प्रकाशन देश भर में हो रहा है । समाचार पत्र ही एक ऐसा साधन है जिससे लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली फली-फूली । समाचार पत्र शासन और जनता के बीच माध्यम का काम करते हैं । समाचार पत्रों की आवाज जनता की आवाज कही जाती है ।

विभिन्न राष्ट्रों के उत्थान एवं पतन में समाचार पत्रों का बड़ा हाथ होता है । एक समय था जब देश के निवासी दूसरे देशों के समाचार के लिए भटकते थे । अपने ही देश की घटनाओं के बारे में लोगों को काफी दिनों बाद जानकारी मिल पाती थी ।

समाचार पत्रों के आने से आज मानव के समक्ष दूरी रूपी कोई दीवार या बाधा नहीं है । किसी भी घटना की जानकारी उन्हें समाचार पत्रों से प्राप्त हो जाती है । विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के बीच की दूरी इन समाचार पत्रों ने समाप्त कर दी है । मुद्रण कला के विकास के साथ-साथ समाचार पत्रों के विकास की कहानी भी जुड़ी है ।

वर्तमान में समाचार पत्रों का क्षेत्र अपने पूरे यौवन पर है । देश का कोई नगर ऐसा नहीं है जहाँ से दो-चार समाचार पत्र प्रकाशित न होते हों । समाचार पत्र से अभिप्राय समान आचरण करने वाले से है । इसमें क्योंकि सामाजिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है इसलिए इसे समाचार पत्र कहा जाता है । उल्लेखनीय है कि भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्थान समाचार पत्र है ।

समाचार पत्र निकालने के लिए कई लोगों की आवश्यकता होती है । इसलिए यह व्यवसाय पैसे वाले लोगों तक ही सीमित है । किसी भी समाचार पत्र की सफलता उसके समाचारों पर निर्भर करती है । समाचारों का दायित्व व सफलता संवाददाता पर निर्भर करती है ।

समाचार पत्र एक ऐसी चीज है जो राष्ट्रपति भवन से लेकर एक खोमचे तक में देखने को मिल जाएगा । समाचार पत्रों के माध्यम से हम घर बैठे विश्व के किसी भी कोने का समाचार पा लेते हैं । समाचार पत्र छपने से पहले कई चरणों से गुजरता है । सबसे पहले संवाददाता समाचार लिखता है । इसके बाद उप संपादक या संपादकीय विभाग से कर्मचारी उसका संपादन करते हैं ।

इसके बाद उसे कंपोजिंग के लिए भेजा जाता है । कंपोजिंग के बाद उसका प्रूफ पढ़ा जाता है । इसके बाद पेज बनता है । पेज बनने के बाद उसे छपने के लिए मशीन विभाग में भेजा जाता है । इस प्रकार समाचार पत्र छपने के बाद उसे सड़क, हवाई तथा रेल मार्ग से विभिन्न स्थानों को भेजा जाता है ।

समाचार पत्रों से हमें जहां विश्व भर की घटनाओं की जानकारी मिलती है वहीं इसमें अपना विज्ञापन देकर व्यवसायी लोग अपना व्यापार भी बढ़ाते हैं । इनमें विज्ञापन देने से हर तबके में मध्य आप अपने उत्पाद का प्रचार कर सकते हैं । समाचार पत्रों में हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ विशेष अवश्य होता है । इसमें महिलाओं से लेकर बच्चों तक के लिए सामग्री प्रकाशित होती है ।

समाचार पत्रों के माध्यम से हमें राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा खेलों, फलों व सब्जियों के भाव, रेलवे आरक्षण, परीक्षा परिणाम, विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश सम्बन्धी जानकारी भी प्राप्त होती है । समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक या फिर त्रैमासिक हो सकता है ।

इनमें दैनिक, सांध्य, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक प्रमुख हैं । रोजाना छपने वाले अखबार दैनिक कहलाते हैं । रोजाना अपराह्न प्रकाशित होने वाले अखबार सांध्य दैनिक कहलाते हैं । इनके अतिरिक्त सप्ताह में एक बार छपने वाला साप्ताहिक तथा पन्द्रह दिनों में एक बार छपने वाला समाचार पत्र पाक्षिक कहलाता है ।

हमारे देश में समाचार पत्र हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलगू तथा संस्कृत भाषाओं में छपते हैं । हिन्दी के बड़े दैनिक समाचार पत्रों में नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण तथा पंजाब केसरी प्रमुख हैं ।

इनके अलावा अंग्रेजी में टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्‌स मैन, पाइनियर, एशियन ऐज आदि प्रमुख दैनिक समाचार पत्र हैं । इनके अलावा हजारों ऐसे समाचार पत्र हैं जिनकी प्रसार संख्या ज्यादा नहीं है या फिर वे क्षेत्रीय समाचार पत्र हैं । उन सबकी जानकारी देना संभव नहीं है ।

समाज, राजनीति में व्याप्त कुरीतियों को दूर कराने में समाचार पत्र काफी सहायक सिद्ध हुए हैं । सरकारी नीति व नौकरशाहों द्वारा किये जा रहे घोटालों का पर्दाफाश समाचार पत्र ही करते हैं । विचारों को स्पष्ट और सही रूप में प्रस्तुत करने का समाचार पत्र से कोई और अच्छा साधन नहीं हो सकता । वर्तमान में विचारों की प्रधानता है । समाचार पत्रों से जहां लाभ हैं वहां हानियां भी हैं ।

पिछले कुछ वर्षों से समाचार पत्रों का किसी न किसी राजनीति दल से गठजोड़ देखने को मिल रहा है । राजनीतिक दलों से गठजोड़ करने वाले समाचार पत्र उनकी नीतियों और विचारों को प्रमुखता से प्रस्तुत करते हैं । इनके अलावा समाचार पत्र के संवाददाता भी कई बार राजनीति से प्रेरित हो किसी समाचार को राजनीतिक रंग दे देते हैं ।

समाचार पत्रों के लाभ यह है कि इनमें एक तरफ समाचार जहां विस्तृत रूप से प्रकाशित होते हैं वहीं इनमें छपी सामग्री को हम काफी दिनों तक संभाल कर रख सकते हैं । दूरदर्शन या टीवी चैनलों द्वारा प्राप्त समाचारों से संबंधित जानकारी हम भविष्य के लिए संभाल कर नहीं रख सकते हैं । इसके अलावा यह क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने के कारण जो लोग हिन्दी या अंग्रेजी नहीं जानते उन तक को समाचार उपलब्ध करवाते हैं ।



जनसंचार माध्यम (टेलिविजन, रेडियो, समाचार-पत्र आदि) किसी भी समाज या राष्ट्र की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रतिबिम्ब होते हैं । भारत जैसे विशाल एवं विकासशील देश में समाचार-पत्र एक महत्वपूर्ण जनसंचार माध्यम है, जो जनसंख्या के व्यापक अंश तक अपनी पहुंच रखते हैं ।

समाचार-पत्रों द्वारा जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़ी जानकारियां स्थायी सामग्री के रूप में उपलब्ध करायी जाती है । ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता के प्रसार ने समाचार-पत्रों के प्रसार को व्यापक बना दिया है । समाचार-पत्रों के प्रसार क्षेत्र द्वारा ही उनकी शक्ति निर्धारित होती है । समाचार-पत्रों का प्रचलन आरंभ होने के बाद से ही वे मानव के दृष्टिकोण एवं विचारों को प्रभावित करते रहे हैं ।

विभिन्न देशों में हुई सामाजिक व राजनीतिक क्रांतियों के अतिरिक्त भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में भी समाचार-पत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रही । पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय सहित अन्य सुधारकों ने भी अपने धार्मिक एवं सामाजिक सुधार कार्यक्रमों को विस्तार देने तथा जन-जन तक पहुंचाने हेतु समाचार-पत्रों का ही सहारा लिया ।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (मराठा, केसरी), सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (बंगाली), भारतेंदु हरिश्चंद्र (संवाद कौमुदी), लाला लाजपत राय (न्यू इंडिया), अरविंद घोष (वंदे मातरम्’), महात्मा गांधी (यंग इंडिया व हरिजन) आदि महान नेताओं एवं राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के संचालकों ने विभिन्न भाषाई समाचार-पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों एवं कार्यों को उजागर करके जन-सामान्य तक पहुंचाया ।

इन समाचार-पत्रों से संपूर्ण विश्व में अत्याचारपूर्ण ब्रिटिश शासन का प्रचार होता था । समाचार-पत्रों की इस बहुआयामी भूमिका के कारण ही ब्रिटिश शासन द्वारा प्रेस पर कठोर प्रतिबंध आरोपित किये गये तथा समाचार-पत्रों एवं उनके संचालकों को अराजक घोषित कर दिया गया । किंतु समाचार-पत्रों द्वारा पैदा किये गये जन-उभार ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने में बहुमूल्य योगदान दिया ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकारी नीतियों तथा विकास कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने में समाचार-पत्रों का योगदान सराहनीय रहा । साक्षरता के प्रसार, राजनीतिकरण तथा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ समाचार-पत्रों की प्रसार संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके फलस्वरूप उनकी शक्तियों का भी विस्तार हुआ है । समाचार-पत्रों की शक्ति के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष हैं ।

सकारात्मक पक्ष: समाचार-पत्र लोगों को दिन प्रतिदिन की घटनाओं से अवगत कराते हैं । समाचार-पत्रों के माध्यम से ही विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समूह एक-दूसरे के दृष्टिकोण, मान्यताओं एवं अपेक्षाओं से परिचित होते हैं । इस प्रकार समाज में एक शांतिपूर्ण सामंजस्य की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है, जिसमें आपसी विवादों एवं मतभेदों का निराकरण सहमतिपूर्ण ढंग से करना संभव होता है ।

समाचार-पत्र सामाजिक व नैतिक मूल्यों के क्षरण को रोकने में सहायक होते हैं तथा प्राचीन परंपराओं एवं उदाहरणों के माध्यम से नैतिकता में जन-मानस की आस्था को सुस्थिर रखने का प्रयास करते हैं । समाचार-पत्रों द्वारा सांस्कृतिक गतिविधियों को सक्रिय रखने में भी गतिशील भूमिका निभायी जाती है ।

समाचार-पत्रों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य जनमत का निर्माण करना है । समाचार-पत्रों को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है । समाचार-पत्र सरकार, सरकारी नीतियों व कार्यक्रमों तथा महत्वपूर्ण फैसलों के विषय में जनमत का निर्माण करते हैं । जनमत का प्रतिनिधित्व करने के कारण समाचार-पत्रों की आवाज को सुनना तथा उस पर जरूरी निर्णय लेना लोकतांत्रिक सरकार के लिए लगभग बाध्यकारी होता है ।

समाचार-पत्रों के विश्लेषण एवं लेखों से चुनावी परिणामों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है । बड़ी संख्या में मतदाता समाचार-पत्रों की खबरों को आधार बनाकर अपना मत निर्णय करते हैं । इस प्रकार समाचार-पत्र किसी पार्टी या व्यक्ति के पक्ष में चुनावी लहर को जन्म देने वाले मुख्य अभिप्रेरक होते हैं ।

समाचार-पत्र स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं के प्रति सरकार एवं जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं तथा उसके निराकरण हेतु सम्बद्ध पक्षों पर दबाव डालते हैं । अपनी शक्तियों के इन्हीं सकारात्मक पक्षों के कारण समाचार-पत्रों से जुड़े पत्रकारों एवं उनके व्यवसाय को सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखा जाता है ।

नकारात्मक पक्ष: स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्षों बाद से ही समाचार-पत्रों को हासिल शक्तियों का दुरुपयोग होना प्रारंभ हो गया । वर्तमान समय में स्वतंत्रता पूर्ण युग की नैतिक पत्रकारिता अतीत की बात बनकर रह गयी है । पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिकता ने समाचार-पत्रों के सामाजिक उत्तरदायित्वों को किनारे रख दिया है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अभिव्यक्ति की प्रतिबद्धता’ का पर्याय मान लिया गया है ।

पत्रकारिता आज एक लाभदायक व्यवसाय बन चुकी है, जिसमें त्याग, समर्पण, सामाजिक जागरूक्‌ता के स्थान पर, सिफारिश एवं गुटबंदी की प्रधानता है । पत्रकारों द्वारा जनहित को समाचारों का लक्ष्य बनाने की बजाय दलाली एवं कमीशन खोरी के आधार पर समाचारों का विकृतिकरण किया जा रहा है ।

बढ़ती व्यावसायिकता ने जनहित की समस्याओं को पीछे धकेलकर विज्ञापन एवं चटपटी खबरों को समाचार-पत्रों का मुख्य अंग बना दिया है । अधिकांश समाचार-पत्रों द्वारा सामान्य जन की भाषा को तिरस्कृत करके अभिजात्यवर्गीय संस्कृति को केंद्र में रख दिया गया है । उन्नति की दौड़ में शामिल सामान्य वर्ग भी इन अभिजात्यवर्गीय संस्कारों को आत्मसात् करने के लिए तत्पर दिखाई देता है ।

आज समाचार-पत्र जनमत के निर्माण की नहीं बल्कि जनमत के भटकाव की प्रक्रिया को गतिशील बनाने में सहयोगी बन रहे हैं । पत्रकारों राजनीतिज्ञों, अफसरों, उद्योगपतियों की चौकड़ी द्वारा जन-सामान्य के ध्यान को मूलभूत मुद्दों से हटाकर सतही समस्याओं पर केंद्रित किया जा रहा है ।

समाचार-पत्रों में जातीय एवं धार्मिक नेताओं के प्रभाववश सामाजिक एवं धार्मिक मतभेदों को उभारने वाली खबरें प्रकाशित होती हैं तथा वास्तविक सामाजिक कार्यकर्ताओं के कार्यों एवं अपीलों को उपेक्षित कर दिया जाता है । इन सब कारणों से समाचार-पत्रों की विश्वसनीयता में कमी आयी है तथा पत्रकारों की स्वच्छतापूर्ण सामाजिक छवि को आघात पहुंचा है ।

समाचार-पत्र की शक्ति को सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों के पोषण में प्रयोग करने के लिए आवश्यक है कि समाचार-पत्रों के संचालकों एवं पत्रकारों को निजी हितों व स्वार्थों से दूर रखने के प्रयास किये जायें । पत्रकारों को सामाजिक व नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहन देने के अपने पवित्र उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना होगा तभी उनकी सम्मानजनक छवि तमाम कठिनाइयों के बाद भी कायम रह सकेगी ।

सुविधा उपभोग की बजाय त्याग व संघर्ष के पथ का चयन ही समाचार-पत्रों की शक्ति को सामाजिक व राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से उपयोगी बना सकता है ।

 मानव जीवन में समाचार-पत्रों का महत्व  आज समाचार-पत्र मनुष्य को देश और दुनिया की सूचना देने का ही कार्य नहीं करते, बल्कि वे मनुष्य की आवश्यकता बन गए हैं । पहले देश-विदेश के समाचार जानने के लिए विशेष वर्ग द्वारा ही समाचार-पत्र पड़े जाते थे । आज शिक्षित उच्च वर्ग ही नहीं बल्कि मेहनतकश मजदूर, रिक्शा, ठेला चलाने वाला अर्धशिक्षित वर्ग भी समाचार-पत्रों का महत्त्व समझने लगा है ।

आज के व्यस्त जीवन में मनुष्य के पास समय का अभाव है । लेकिन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे विभिन्न क्षेत्रों से सम्पर्क बनाना पड़ता है । आज समाचार-पत्र मनुष्य को समाज के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से जोड़े रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।

मानव जीवन में समाचार-पत्र परिवार के महत्त्वपूर्ण सदस के रूप में प्रवेश कर चुके हैं, जिनके एच्छ भी दिन न मिलने पर खालीपन महसूस होता है । भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरानस्थ्य-पत्रों ने देश में जन-जागरण का महत्त्वपूर्ण कार्य किया था ।

समाचार-पत्रों में देश भक्ति की भावना जागृत करने, वाले, लेख एवं कविताएँ पढ़-पढ़कर देश की जनता उत्साहित होकर स्वतंत्रतां दोलन में अपना सहयोग देने लगी थी । आज भी समाचार-पत्र लोगों को जागरूक करने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।

लोगों को उनके अधिकारों से अवगत कराने के अतिरिक्त समाचार-पत्र अष्ट सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, मंत्रियों आदि का भंडाफोड़ करके लोगों को सचेत भी कर रहे हैं । वास्तव में समाचार-पत्र आम आदमी के मन-मस्तिष्क से बड़े अधिकारियों, मंत्रियों आदि का भय निकालने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं ताकि आम आदमी भ्रष्ट अधिकारियों मंत्रियों के विरोध में आवाज उठा सके ।

निस्संदेह समाचार-पत्रों ने मानव समाज को अत्याचार का विरोध करने का साहस प्रदान किया है । मानव-समाज को जागरूक करने के अतिरिक्त आज समाचार-पत्र लोगों को विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी कर रहे हैं ।

समाचार-पत्रों के माध्यम से लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में हो रही प्रगति की जानकारी ही नहीं मिल रही, बल्कि उन क्षेत्रों में प्रवेश के मार्ग भी दिखाए जा रहे हैं । आज रोजगार के लिए युवा-पड़ी समाचार-पत्रों से पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकती है । विभिन्न क्षेत्रों के संस्थान और योग्य उम्मीदवारों के मध्य समाचार-पत्र सेतु का कार्य कर रहे हैं ।

समाचार-पत्रों के माध्यम से आज शिक्षित युवा-पीढ़ी को देश-विदेश में नौकरी के अवसरों तथा विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण की जानकारी मिल रही है । देश-विदेश में व्यापार के आदान-प्रदान के लिए भी समाचार-पत्रसशक्त माध्यम बन रहे हैं ।

आज मानव रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी समाचार-पत्रों पर निर्भर हो गया है । विशेषकर विस्तार लेते जा रहे नगरों महानगरों में सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों की जानकारी, विभिन्न: उत्पादों की खरीदारी आदिके लिए लोगों को समाचार-पत्रों की सहायता लेनी पड़ती है ।

प्रतियोगिता के इस युग में विभिन्न उत्पादों की कम्पनियाँ भी समाचार-पत्रों के माध्यम से अपने उत्पादों की विशेषताएँ ग्राहकों को बता रही हैं । ग्राहकों को घटिया उत्पादों की जानकारी भी समाचार-पत्रों से मिलरही है ।

आज ग्राहक किसी भी प्रकार की खरीदारी के लिए स्वयं निर्णय लेने से पूर्व समाचार-पत्रों के दिशा-निर्देश पर विचार करता है । आधुनिक मानव-समाज में समाचार-पत्र इतने अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए हैं कि एक मित्र की भाँति वे सामाजिक रिश्ते बनाने का कार्य भी कर रहे हैं । आज देश-विदेश में रोजगार अथवा नौकरी के कारण मनुष्य अपने सम्प्रदाय अथवा जाति-बिरादरी से दूर रहने पर विवश है ।

ऐसी स्थिति में मनुष्य को विवाह-सम्बंधों के लिए समाचार-पत्रों की सहायता लेनी पड़ रही है । समाचार-पत्रों के वैवाहिक विज्ञापनों के द्वारा आज अधिकाधिक विवाह सम्पन्न हो रहे हैं । बल्कि पहले जाति-बिरादरी में सीमित सम्बन्धों के कारण वर-वधू खोजने के सीमित अवसर हुआ करते थे । आज वैवाहिक विज्ञापनों के द्वारा योग्य वर-वपू के अधिक अवसर मिल रहे हैं ।

वास्तव में समाचार-पत्र आज मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । मनुष्य जीवन की अधिकांश आवश्यकताओं के लिए समाचार-पत्रों पर निर्भर हो गया है । स्पष्टतया समाचार पत्रों के अभाव में आज मानव-जीवन सूना है ।

 समाचार-पत्र पढ़ने के लाभ  समाचार पत्रों के अपने महत्त्व और लाभ हैं । आधुनिक समय में समाचार पत्रों को सूचना समाचार एवं विचारों के प्रसार का अच्छा माध्यम समझा जाता है । समाचार पत्रों के बहुत से लाभ हैं । समाचार पत्र विश्व के प्रत्येक हिस्से के समाचार हम तक पहुँचाते हैं ।

किसी ने सच ही कहा है आज का युग ‘प्रेस’ एवं प्रात: कालीन सामाचार पत्र का युग है । समाचार पत्र आज की दुनिया में लोकमत को प्रतिबिम्बित करता है । सामाचार पत्र द्वारा वास्तविक लोकमत का मापन सम्भव होता है । समाचार पत्रों में बहुत उपयोगी जानकारी अन्तर्विष्ट होती है ।

लोगों को ने केवल अपने देश बल्कि सम्पूर्ण विश्व के विचारों एवं विचारधाराओं के विषय में जानकारी मिलती है । समाचार पत्रों में हमें देश-विदेश के समाचार पढ़ने को मिलते हैं । सामाजिक राजनैतिक आर्थिक वैज्ञानिक साहित्यक एवं धार्मिक घटनाओं की रिर्पोट सभी समाचार पत्रों द्वारा दी जाती है ।

समाचार पत्र विश्व के सभी देशों में आपसी भाईचारा एवं सौर्हाद पूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक होते हैं । समाचार पत्र विज्ञापन एवं प्रचार का एक अच्छा माध्यम हैं । समाचार पत्रों के स्तम्भों से हमें विभिन्न प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है ।

कुछ समाचार पत्र हत्या सेक्स अपराध घोटालों तलाक अपहरण एवं इस तरह के अन्य विषयों की खबरें छापते है । इस तरह के समाचारों के प्रचार प्रसार से पाठकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है । किन्तु समाचार पत्रों के फायदों को देखते हुये इन नुकसानों की अवहेलना की जा सकती है ।

आज कल प्रत्येक समाचार पत्र किसी संदेश को प्रतिपादित करता है जबकि उसे निष्प क्ष होकर समाचार छापने चाहिये । कुछ समाचार पत्र अपनी विचारधाराओं का प्रचार करने में लगे हुये हैं । इन विचारों से समाचार पत्र के वास्तविक उद्देश्य को नुकसान पहुँचता है ।

समाचार पत्र विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर जनमत को परिवर्तित करने में एक बड़ी भूमिका निभाता है । समाचार पत्र लोगों को शिाइ क्षत करने में भी सहायक होते हैं । वह हमें हमारे कर्त्तव्यों के विषय में बताते हैं एवं हमारी जिम्मेवारियों का एहसास कराते हैं ।

देश में व्याप्त कई समस्याओं पर वह अपनी न्यायपूर्ण उचित एवं ईमानदार राय प्रस्तुत करते हैं । इस तरह वह आम जनता का पथ प्रशस्त करते हैं । शिक्षा के दृष्टिकोण से उनका बहुत महत्त्व है । समाचार पत्र विभिन्न क्षेत्रों में हुयी नवीनतम खोजों अविष्कारों एवं अनुसंधानों के विषय में रिर्पोटों को प्रकाशित कर सकते हैं ।

विश्वविख्यात विचारक, लेखक, कवि, वैज्ञानिक, समाज सुधारक, दार्शनिक एवं राजनितिज्ञ, समाचार पत्रों द्वारा प्रसिद्धि पाते है । इस तरह समाचार पत्र आधुनिक समाज के महत्त्वपूर्ण आधार हैं । इससे व्यापार एवं व्यवसाय को प्रोत्साहन मिलता है । यह राष्ट्रीय मत के प्रतीक हैं । इनमें वास्तविक विचार प्रतिबिम्बित होते हैं । संक्षेपत: हम यह कह सकते हैं कि समाचार पत्रों के बहुत विस्मयकारी लाभ हैं ।

 वर्तमान समाज के निर्माण में समाचार पत्र की भूमिका समाचार पत्र आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में जन साधारण को सूचना प्रदान करने का सर्वोत्तम साधन है । आज सामाजिक उत्थान पतन को हम समाचार पत्र के माध्यम से भली भांति जान सकते हैं ।

लोकतात्रिक प्रणाली में समाचार पत्र जन-जागरण का साधन है । जनमत संग्रह और निर्माण में यह दिशा निर्देशक का कार्य करती है । समाचार पत्र लोगों को जागरूक करने का कार्य करती है । भारतीय समाज के निर्माण में समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।

स्वतंत्रता के पूर्व आम भारतीयों में ब्रिटानी सरकार की दासता से मुक्त होने का भाव जगाने में समाचार पत्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । किन्तु रचतंत्रता के पूर्व समाचार पत्र नवीन समाज के निर्माण के लिए जिस तरह एक ‘मिशन’ की तरह काम करते थे, जिस प्रकार उनका उद्येश्य लोगो को जागरूक करना था आधुनिक समय में उसका वह स्वरूप नहीं रह गया है ।

भारतीय पेशा सर्वेक्षण के निदेशक भी.डी.शर्मा के अनुसार, ”समाचार पत्र मानव के व्यावहारिक गतिविधियों के बारे में समाचार -वगैर विचारों का प्रकाशन करता है ” । व्यापक अर्थ में समाचार पत्र आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का चौथा आधार स्तंभ और लोक तंत्र का सजग प्रहरी है ।

इस संदर्भ में उसका महत्व उस फौजी से किसी भी तरह कम नही है जो अपने घर से मीलों दूर मातृभूमि की रक्षा के लिर सीमा पर तैनात रहता है । वर्तमान समाज में भी यह जन संचेतना और नवजागरण के संवाहक की भूमिका निभाता है । यदि समाचार पत्र न रहे तो समाचारों का आदान-प्रदान नही होगा और पूरी दुनिया की वैचारिक क्राति की गति और विकास अवरूद्ध हो जाएगी ।

समाचार पत्र समाज में घटित होने वाली घटना की सूचना ही नहीं देना अपितु उस घटना के फलस्वरूप जन्म लेने वाली प्रतिक्रिया से भी नवगत कराता है । यह साहित्य और संस्कृति का संवाहक भी है और दोनों को पोषित भी करता है ।

आधुनिक समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और हिंसा बढ़ रही है । चारों तरफ अराजकता, विखंडता और अलगाववाद का विगुल बज रहा है ऐसी परिस्थिति में समाचार पत्रों में प्रकाशित विचारों का संतुलित होना आवश्यक है ।

समाचार पत्र आधुनिक समाज का ताप मापक यंत्र है । एक ओर जहाँ यह राजनीतिक आर्थिक नीतियों तथा कडि, अपराध और दुघर्टनाओं की खबर देता है वहीं अकाल, महामारी, अतिवृष्टि, महत्वपूर्ण विभूतियों की मृत्यु और विकारपोम्मुखी खबरों से भी अवगत कराता है ।

समस्यापरक और घटनापरक दोनों ही प्रकार के समाचारों का प्रेषण करने के साथ-साथ एक तटस्थ समीक्षक की भूमिका का निर्वहन कर समाज को नवीन दृष्टि प्रदान करने का कार्य भी करता है । यह देश काल का यथार्थ चित्र जन जीवन के समक्ष प्रस्तुत कर देश सेवा, राष्ट्रप्रेम और समाज सुधारक की भूमिका का निर्वाह करता है ।

दूसरी ओर दबाव, उत्कोच अथवा पक्षधरता से प्रभावित होकर देश और समाज के लिए संकट भी उत्पन्न कर सकता है । सच्चा समाचार पत्र जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है । राजनैतिक शोपण उपार्थिक उत्पीड़न, स्थानीय समस्याओं का चित्रण आदि के द्वारा यह मृक और निरीह जनता की ओर से आवाज उठाता है ।

गरीब और कमजोरों का मार्गदर्शन करता है । साधारण जनता को उसके रचत्व और अधिकारों से परिचित करा कर उनमें नवीन चेतना को उदित करता है । यदि समाचार पत्र संकुचित उद्येश्य से प्रेरित होकर मिथ्या प्रचार न करे तो यह समाज निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है ।

Thursday, 29 March 2018

3 most important English essay

The Mad Woman

I walk a kilometre or so to school every morning. Sometimes I come across a mad woman dressed in a dark dirty sari. She probably has not had a bath for years. Her hair is matted, teeth stained red with betel-nut and eyes blood-shot with the look of madness. I always keep my distance from her for my own safety for I cannot be sure what she will do next. Also she smells terrible up close.

It is never pleasant when I see her standing by the roadside. She is by no means violent but she has the nasty habit of following people who pass by. Normally when I see her I cross over to the other side of the road just to avoid her. Usually that works. Sometimes she crosses the road too. So I run. Fortunately she cannot run very fast and gives up after a while.

One morning, as I crossed the road to avoid her, she tried to cross too. I started to run. She started to run too but tripped on her sari. She fell down hard on the road and lay there in a heap. I wanted to keep running but I saw that she was in great danger of being run over by a car. So I ran over to her to pull her to the roadside.

As much as I disliked it, I had to help her. The other passers-by did not seem to bother. So I held my breath and pull her by her arms towards the roadside. By now people and cars had stopped to watch. No one helped but at last I managed to drag her to safety.

She opened her eyes and gave me a smile. I could only stare at her dumbly. Then I turned and hurried to school to wash my hands.

I am going to get a bicycle to cycle to school. It is much faster this way. Also I will not have to contend with the mad woman again. 

An Accident

The road in front of my school is a narrow one. It is also very busy. Every afternoon when school is dismissed the road becomes almost impassable as children, bicycles, cars and buses jostle and struggle to use it. Sometimes a policeman is there to help things out, but generally chaos reigns and we have to be careful not to get involved in an accident.
A few accidents had already occurred. I was a witness to one.

If happened just after school. As usual the road was an utter mad house. Children were running across the road to get to their cars and buses. Cars and buses honked angrily at them.

Just then I saw a young boy make a dash across the road. There was a loud blare of horn, a squeal of brakes and I saw a car knock into the boy. He fell as though his feet were swept from under him.

Fortunately the car was not moving very fast and the driver managed to stop the car before a wheel could run over the fallen boy.

All traffic stopped. I ran over to the boy and saw blood on the road. He was bleeding from a cut on his head. A man came and examined the boy. Then he lifted the boy and carried him to a car. They sped off, presumably to the hospital.

Many people surrounded the driver who looked dazed and bewildered. A policeman came to calm things down.

As there was nothing I could do, I turned and walked down the road carefully. It was terrible to witness an accident. I certainly would not like to be involved in one. 

An Accident

The road in front of my school is a narrow one. It is also very busy. Every afternoon when school is dismissed the road becomes almost impassable as children, bicycles, cars and buses jostle and struggle to use it. Sometimes a policeman is there to help things out, but generally chaos reigns and we have to be careful not to get involved in an accident.
A few accidents had already occurred. I was a witness to one.

If happened just after school. As usual the road was an utter mad house. Children were running across the road to get to their cars and buses. Cars and buses honked angrily at them.

Just then I saw a young boy make a dash across the road. There was a loud blare of horn, a squeal of brakes and I saw a car knock into the boy. He fell as though his feet were swept from under him.

Fortunately the car was not moving very fast and the driver managed to stop the car before a wheel could run over the fallen boy.

All traffic stopped. I ran over to the boy and saw blood on the road. He was bleeding from a cut on his head. A man came and examined the boy. Then he lifted the boy and carried him to a car. They sped off, presumably to the hospital.

Many people surrounded the driver who looked dazed and bewildered. A policeman came to calm things down.

As there was nothing I could do, I turned and walked down the road carefully. It was terrible to witness an accident. I certainly would not like to be involved in one.